नई दिल्ली. हर वर्ल्ड कप की अपनी एक पारी होती है, जो स्कोरबोर्ड से ऊपर उठकर इतिहास बन जाती है. 1983 में जब कपिल देव ने जिम्बाब्वे के खिलाफ 175 रनों की नाबाद बिजली जैसी पारी खेली थी, तो भारत ने पहली बार सपने देखने की हिम्मत की थी और वही सपना दो हफ़्तों बाद कप बनकर सिर पर चढ़ा. 2017 में हरमनप्रीत कौर की 171 रनों की आग ने ऑस्ट्रेलिया जैसी टीम को राख कर दिया, और उस रात पूरी दुनिया ने देखा कि “इंडियन क्रिकेट” अब सिर्फ मर्दों की कहानी नहीं है.
अब वक्त है सोशल मीडिया के युग की नई ‘ब्लू स्टॉर्म’ का जेमिमा रॉड्रिग्स उनका शतक सिर्फ एक पारी नहीं था, यह एलान था कि भारतीय महिला क्रिकेट अब बैकपेज से निकलकर हेडलाइन बन चुकी है. हर चौका, हर छक्का, हर सेल्फी सबने मिलकर एक क्रांति को हवा दी है. यह वह दौर है जब लड़कियाँ मैदान में नहीं झिझकतीं, दबाव नहीं झेलतीं, बल्कि दबाव को तोड़ती हैं. इस वर्ल्ड कप में जेमिमा की बैट ने सिर्फ गेंदों को नहीं उड़ाया, बल्कि उन पुराने सवालों को भी हवा में उड़ा दिया कि “क्या लड़कियाँ बड़ा मैच जीत सकती हैं?” अब जवाब बल्ले से मिल चुका है गूंजते हुए, दमदार अंदाज़ में. यह कहानी सिर्फ क्रिकेट की नहीं, यह उस भारत की है जो अब बराबरी नहीं माँगता, सीधा मंच छीन लेता है.
1983 में कपिल देव का करिश्मा
1983 में जब कपिल देव ने ज़िम्बाब्वे के खिलाफ 175 रनों की नाबाद पारी खेलकर भारत को निराशा की गहराइयों से बाहर निकाला था, तब वहाँ कोई टेलीविज़न कैमरा मौजूद नहीं था. दुनिया उस ऐतिहासिक पारी को देख नहीं पाई, लेकिन उनके साथियों के लिए वह पारी किसी चमत्कार से कम नहीं थी. उस पारी ने टीम के भीतर यह विश्वास भर दिया कि असंभव भी संभव हो सकता है और आने वाले दो हफ्तों में वही सपना हक़ीक़त बन गया.
2017 में हरमनप्रीत की हैरतअंग्रेज पारी
2017 के सेमीफाइनल में जब हरमनप्रीत कौर ने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ 171 रनों की नाबाद पारी खेली, तो वह पूरी दुनिया में सीधा प्रसारित हो रही थी. हरमनप्रीत उस वक्त नवनिर्वाचित राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद से भी ज़्यादा ट्रेंड कर रही थीं. वह करोड़ों भारतीयों के लिए विश्वास का प्रतीक बन गईं ‘एक नीले अरब’ का सपना साकार करने वाली.
2025 में जेमिमा का जलवा
सोशल मीडिया के इस युग में जेमिमा रॉड्रिग्स की नाबाद शतकीय पारी का असर कम से कम दस गुना ज़्यादा है. वह चर्चा में हैं, और उनके साथ पूरी टीम भी. जेमिमा की पारी और ऑस्ट्रेलिया पर भारत की जीत ने केवल भारत को फाइनल तक नहीं पहुँचाया, बल्कि महिला क्रिकेट को वह नई पहचान दी जिसकी उसे सख़्त ज़रूरत थी. इससे भी बढ़कर, उन लड़कियों को आवाज़ मिली है जो अब तक अपने भीतर चुपचाप हरमनप्रीत, जेमिमा या स्मृति बनने का सपना देखती थीं, पर पारिवारिक या सामाजिक दबाव के चलते कुछ कह नहीं पाती थीं. अब उनके पास प्रेरणा है लेकिन इस प्रेरणा को मुकाम तक पहुँचाना ज़रूरी है. भारत बहुत बार बहादुरी से खेला है, पर हार का स्वाद चखा है पर इस बार जेमिमा की पारी ने चीजें बदल दी.
सालों बाद जब भारत में महिलाओं के सशक्तिकरण की कहानी लिखी जाएगी, तो उसमें हरमनप्रीत, स्मृति और जेमिमा के नाम ज़रूर दर्ज होंगे वे खिलाड़ी जिन्होंने कई बार की विश्व चैम्पियन ऑस्ट्रेलिया को हराकर इतिहास रचा. ये तीनों अब भारतीय महिला खेलों के नए संविधान की प्रस्तावना लिख रही हैं. खेल के चैंपियनों के लिए तरसते इस देश में यह टीम उम्मीद की एक नई हवा लेकर आई है, जिसने प्रशंसकों के दिलों पर गहरी छाप छोड़ी है.