सूखी रोटी, आचार और झिरिया का पानी…कुछ ऐसा जीवन जी रहे Hawk Force के जवान, मलेरिया से जंग जारी

सूखी रोटी, आचार और झिरिया का पानी…कुछ ऐसा जीवन जी रहे Hawk Force के जवान, मलेरिया से जंग जारी


मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के घने जंगल पिछले करीब 35 सालों से माओवाद (Maoism) के कलंक को झेल रहे हैं. केंद्र सरकार ने इस नक्सलवाद को 31 मार्च 2026 तक खत्म करने की डेडलाइन तय की है, जिसके बाद से ही इन जंगलों में नक्सल विरोधी ऑपरेशन बहुत तेज हो गए हैं. इस वक्त एक हजार से ज्यादा जवान (हॉक फोर्स, CRPF और कोबरा) बालाघाट के दुर्गम जंगलों में सर्चिंग में जुटे हैं.

लेकिन, उनकी यह लड़ाई सिर्फ बंदूक और नक्सलियों तक सीमित नहीं है. इन जवानों को जंगल में कदम-कदम पर वन्य प्राणी, दूषित पेयजल, और प्राकृतिक आपदाओं से भी जूझना पड़ता है. लोकल 18 की यह खास रिपोर्ट बताती है कि देश की रक्षा में जुटे इन बहादुर जवानों को किन मुश्किलों का सामना करना पड़ता है.

मलेरिया का हमला, बीमार पड़े 6 से ज्यादा जवान
हाल ही में नक्सल ऑपरेशन में जुटे सीआरपीएफ (CRPF) और हॉक फोर्स के आधा दर्जन से ज्यादा जवान मलेरिया की चपेट में आ गए. इन सभी जवानों को तुरंत इलाज के लिए जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया.

जंगलों के अंदर कैंपों में तैनात ये जवान, घने पहाड़ों और दूर-दूर तक सर्चिंग करने जाते हैं. ऐसे में उन्हें अपनी भूख, प्यास, और सबसे बढ़कर जंगली मच्छरों के प्रकोप का सामना करना पड़ता है. शिव शंकर यादव, अनेश उईके, गजानंद गोवारे, उमरकर धनंजय, शुभम, रवि कुमार और सचिन सिरसाठे जैसे कई जवान इसी मलेरिया से बीमार पड़ गए थे.

एक जवान ने अपना दर्द बयां करते हुए कहा कि  जब हम बीमार पड़ते हैं, तो दिल टूट जाता है. ऐसे में सोचते हैं कि क्या करने आए थे और क्या हो गया. लेकिन जब फीट हो जाते हैं, तो और उमंग से काम करते हैं.

सूखी रोटी, आचार और झिरिया का पानी
जंगलों में सर्चिंग पर जाने वाले इन जवानों की दैनिक चुनौतियां किसी भी आम आदमी की कल्पना से परे हैं.

एक जवान ने बताया कि वे जब सर्चिंग के लिए जाते हैं, तो चार-चार दिन तक जंगल में ही रहते हैं. उनके पास खाने के लिए सिर्फ सूखी रोटियाँ और आचार होता है. पीने के लिए वे 8 लीटर पानी लेकर जाते हैं, लेकिन पानी खत्म होने पर उन्हें झिरिया (पहाड़ी झरनों) का पानी पीना पड़ता है. यह दूषित पानी ही उन्हें बीमार करता है.

नक्सलवाद खत्म करने की डेडलाइन पास आने के कारण जवानों पर वर्क लोड भी बढ़ गया है. एक जवान ने बताया कि पहले सर्चिंग 2 से 3 दिन की होती थी, लेकिन अब यह बढ़कर 6 से 7 दिन तक चली जाती है. यहां-वहां का पानी पीने से वे बीमार पड़ते हैं, और ज्यादा समस्या होने पर उन्हें अस्पताल रेफर करना पड़ता है.

मधुमक्खी का हमला और जंगली जानवर
वन्य प्राणियों का खतरा भी जवानों पर हमेशा बना रहता है. इससे पहले भी जंगल में सर्चिंग कर रहे हॉक फोर्स के चार जवान मधुमक्खियों के हमले में गंभीर रूप से घायल हुए थे. 30 से 40 जवानों की टीम ने बड़ी मशक्कत से अपने साथियों को मधुमक्खियों से बचाया था.

ये जवान देश को नक्सल मुक्त करने के लिए न केवल नक्सलियों से, बल्कि मलेरिया, सूखी रोटी और जंगल के हर छोटे-बड़े खतरे से लगातार संघर्ष कर रहे हैं. उनके इस बलिदान और संघर्ष को सलाम!



Source link