शुभम मरमट, उज्जैन: विश्व प्रसिद्ध बाबा महाकाल की नगरी उज्जैन, जहां मोक्षदायिनी मां शिप्रा नदी का वास है, हर 12 साल में सिंहस्थ (कुंभ) मेले के लिए तैयार होती है. साल 2028 में लगने वाले इस महाकुंभ में करोड़ों श्रद्धालु आस्था की डुबकी लगाने उज्जैन पहुँचेंगे. शासन-प्रशासन अभी से इस बड़े आयोजन को सफल बनाने की तैयारियों में जुट गया है, जिसके तहत स्थायी कुंभ नगरी बसाने के लिए एक लैंड पुलिंग योजना लाई गई है.
लेकिन, इस योजना ने उज्जैन के किसानों को दो खेमों में बाँट दिया है. जहाँ एक तरफ किसान इस योजना को अपने हित में बताकर समर्थन कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर भारतीय किसान संघ और कुछ किसान इसका जोरदार विरोध कर रहे हैं. यह ‘जमीन’ का संग्राम अब महाकाल की नगरी में गरमाता जा रहा है.
कलेक्टर का भरोसा और किसानों का समर्थन
प्रशासन ने इस पूरे विवाद पर अपना रुख साफ कर दिया है. उज्जैन कलेक्टर रोशन कुमार सिंह ने स्पष्ट कहा है कि किसी भी किसान की जमीन बिना सहमति के अधिग्रहित नहीं की जा रही. उन्होंने साफ कहा है कि जो किसान विकास कार्यों के लिए अपनी जमीन देना चाहते हैं, उनकी मर्जी से ही जमीन ली जा रही है. कलेक्टर के इस भरोसे के बाद कुछ गाँव के किसान खुलकर योजना के समर्थन में आ गए हैं.
मोहनपुरा, खिलचीपुर, कमेड गांव के कई किसानों ने प्रशासन को सहमति पत्र सौंपकर जमीन देने की हामी भरी है. मोहनपुरा निवासी किसान अनिल ने बताया कि उनकी कुल 39 बीघा जमीन है, जिनमें से करीब 2 बीघा जमीन सिंहस्थ क्षेत्र में आती है. अनिल का कहना है कि उन्होंने स्वेच्छा से सहमति पत्र कलेक्टर को सौंपा है. वह कहते हैं कि हम विकास चाहते हैं, इसलिए अपनी 2 बीघा जमीन सरकार को देने के लिए तैयार हैं. हमारी इच्छा है कि हमारी जमीन का उपयोग सड़क, नाली और अन्य सुविधाओं के निर्माण में हो, ताकि पूरा क्षेत्र आगे बढ़े.
संतों का मत
इस योजना के समर्थन में संत समाज भी आगे आया है. बड़नगर रोड स्थित आश्रम के महामंडलेश्वर प्रेमानंद महाराज ने भी अपनी 12 बीघा जमीन लैंड पुलिंग योजना में देने पर सहमति जताई है. उनका कहना है कि सरकार जब श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए सड़क और ड्रेनेज जैसी आवश्यक व्यवस्था करना चाहती है, तो इसका विरोध उचित नहीं है. यह योजना किसानों के हित में है.
‘जान दे देंगे, जमीन नहीं!’
जहाँ कुछ किसान विकास के लिए जमीन देने को तैयार हैं, वहीं भारतीय किसान संघ लगातार इस योजना का कड़ा विरोध कर रहा है. संघ का कहना है कि किसानों को जबरन डरा-धमकाकर सहमति ली गई है.
भारतीय किसान संघ के प्रदेश महामंत्री भारत सिंह बेस ने गंभीर आरोप लगाए हैं. उन्होंने कहा कि जिन किसानों ने पहले क्षेत्र में अवैध निर्माण किया था, उन्होंने डर के माहौल में जमीन देने की हामी भरी है. उन्होंने प्रशासन से मांग की है कि सभी किसानों की वास्तविक सहमति सुनिश्चित की जाए और किसी पर भी दबाव न बनाया जाए.
मोहनपुरा के किसान मोहनलाल कुमावत का साफ कहना है कि हम जान दे देंगे लेकिन जमीन नहीं देंगे. सरकार हमसे जबरन हमारी जमीन ले रही है, जबकि हम जमीन देना नहीं चाहते हैं.
कलेक्टर के वादे के बावजूद, किसान संघ अपनी लड़ाई जारी रखे हुए है. संघ ने 18 नवंबर से पहले लैंड पुलिंग कानून वापस नहीं लिए जाने पर ‘घेरा डालो, डेरा डालो’ आंदोलन शुरू करने की घोषणा की है. इसके तहत सैकड़ों किसान कलेक्ट्रेट को घेरकर वहीं रहने और खाने-पीने की तैयारी कर रहे हैं. 2028 के सिंहस्थ से पहले MP सरकार के सामने किसानों की यह लड़ाई एक बड़ी चुनौती बनकर खड़ी हो गई है.