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मध्य प्रदेश में एक ऐसा राजमहल है, जहां राजशाही दौर में भी सीढ़ियों की जगह लिफ्ट इस्तेमाल हुआ करती थी. रतलाम के रणजीत विलास पैलेस में लकड़ी से बनी है. यह अनोखी लिफ्ट लगी है. यहां स्कॉटलैंड से कांच और बेल्जियम के ग्लास से की गई.
महल और किले तो आपने कई देखे होंगे लेकिन, रतलाम का रणजीत विलास पैलेस देश के उन चुनिंदा महलों में से एक है, जहां राजशाही दौर में ही लिफ्ट लगा दी गई थी. उस समय यह सुविधा सिर्फ विदेशों के बड़े प्रासादों में देखने को मिलती थी. महल की यही खासियत आज भी पर्यटकों और इतिहास प्रेमियों को अपनी ओर खींचती है

इतिहासकारों के अनुसार, यह विशाल राजमहल वर्ष 1880 में महाराज रणजीत सिंह राठौर द्वारा बनवाया गया था. 14वें महाराज सज्जन सिंह राठौर ने महल में भव्य इंटीरियर का काम करवाया. इन्हीं के काल में इस महल में लकड़ी की विशेष यूरोपीय शैली की लिफ्ट लगवाई गई, जो ग्राउंड फ्लोर से तीसरी मंजिल तक चलती थी, बिना बिजली के चलती थी.

रणजीत विलास पैलेस को यूरोपीय और इटालियन वास्तुकला से तैयार किया गया. स्कॉटलैंड से रंगीन कांच के गुंबद, बेल्जियम के ग्लास और विदेशों से मंगवाई गई निर्माण सामग्री के कारण यह अपने समय का सबसे आधुनिक राजमहल माना गया. इसका हर हिस्सा उस दौर की उच्च गुणवत्ता और शाही जीवनशैली को दर्शाता है.

महल के इंटीरियर में सागवान की लकड़ी, नक्काशीदार दीवारें और हैंडमेड वालपेपर का विशेष उपयोग किया गया. यही नहीं, लकड़ी से बनी लिफ्ट आज भी यहां के मुख्य आकर्षणों में से एक है. कहा जाता है कि राजशाही समय में इतने आधुनिक निर्माण की कल्पना भी दुर्लभ थी, और रतलाम के इस महल ने उस सोच को वास्तविक रूप दिया.

दरबार हॉल के ऊपर बना रंगीन कांच वाला गुंबद इस महल की शान है. स्कॉटलैंड से मंगाए गए इस गुंबद की खासियत यह है कि पूरे भारत में ऐसा रंगीन कांच सिर्फ रतलाम के रणजीत विलास पैलेस और मैसूर के अंबा पैलेस में ही देखने को मिलती है. गुंबद से छनकर आने वाली रोशनी महल के दरबार हॉल को राजसी आभा से भर देती है.

महल के कमरों, उजालदान, दरवाजों और खिड़कियों में लगे हर छोटे-बड़े कांच पर रतलाम राजवंश का राजचिह्न उकेरा हुआ है. यह उस समय की बारीक कारीगरी और राजपरिवार की भव्य जीवनशैली का अनोखा उदाहरण है. हर कोना राजवंश के गौरव और विलासिता की कहानी कहता है.

लेकिन, रतलाम के अंतिम महाराज लोकेंद्र सिंह राठौर की मौत के बाद इस महल का कोई वारिस नहीं बचा. संपत्ति लंबे समय तक कानूनी विवादों में फंसी रही और बाद में यह पूरा परिसर मध्य प्रदेश शासन के अधीन आ गया. आज यह महल देखरेख के अभाव में अपनी ऐतिहासिक पहचान खो रहा है. कई जगहों से महल क्षतिग्रत हो गया है.