खंडवा. कभी लाखों की सैलरी पाने वाले और एक शानदार जिंदगी जीने वाले हरीश प्रजापति ने अपने जीवन में ऐसा फैसला लिया, जिसे सुनकर लोग आज भी हैरान रह जाते हैं. मध्य प्रदेश के खंडवा जिले के दिवाल गांव के रहने वाले हरीश एक जाने-माने प्रोजेक्ट इंजीनियर थे. गुजरात से लेकर कई बड़ी कंपनियों में उन्होंने बेहतरीन काम किया. 50 हजार रुपये सैलरी थी. परिवार सुखी था और जिंदगी आराम से चल रही थी लेकिन एक रात उन्हें ऐसा सपना आया, जिसने उनका जीवन पूरी तरह बदल दिया. इस सपने ने उन्हें आध्यात्मिकता के रास्ते पर ला खड़ा किया और हरीश ने बिना कुछ सोचे अपनी नौकरी छोड़ दी. इसके बाद वह नर्मदा माई की परिक्रमा के पवित्र मार्ग पर निकल पड़े.
हरीश लोकल 18 को बताते हैं कि उनकी इस आध्यात्मिक यात्रा के पीछे सबसे बड़ा हाथ उनके गुरुदेव विभु जी महाराज का है, जिनके साथ रहते हुए उन्होंने जीवन का असली अर्थ समझा. गुरुजी के सानिध्य में उन्हें ऐसा अनुभव मिला, जिसका असर उनके मन पर गहराई से हुआ. गुरु विभु जी ने 51,108 शिवलिंगों की स्थापना का बड़ा संकल्प लिया है और इस पुण्य कार्य में हरीश भी लंबे समय से जुड़े हुए हैं. इसी दौरान उनके मन में आया कि दुनिया की इस भागदौड़ में पैसा, गाड़ी और नौकरी सब कुछ नहीं है. असली सुख तो आत्मा की शांति में है.
हरीश ने जब परिवार को बताया तो…
हरीश कहते हैं कि वह अपने परिवार के बहुत करीब हैं. माता-पिता, भाई-भाभी, पत्नी और बच्चे सभी उनके जीवन का हिस्सा हैं. जब हरीश ने उन्हें बताया कि वह नौकरी छोड़कर नर्मदा परिक्रमा पर जाना चाहते हैं, तो परिवार ने उन्हें रोका नहीं बल्कि उनके इस निर्णय को सराहते हुए उनका साथ दिया. हरीश के करीबी मित्र नवनीत ठाकुर ने भी उन्हें प्रेरित किया कि अगर दिल कह रहा है, तो इस यात्रा पर जरूर जाओ. बस फिर क्या था, हरीश ने अपना मन पक्का किया और यात्रा की शुरुआत ओंकारेश्वर से कर दी.
मां नर्मदा ने सपने में दिए दर्शन
वह आगे बताते हैं कि एक रात उन्होंने सपने में मां नर्मदा को देखा, जिसमें नर्मदा माई के प्रति भक्ति का गहरा आकर्षण महसूस हुआ. उस रात के बाद उनके मन में बार-बार यही विचार आने लगा कि जीवन सिर्फ कमाई, सुविधा और आराम तक सीमित नहीं होना चाहिए. इंसान को ऐसा काम करना चाहिए, जिससे आत्मा को शांति मिले और दूसरों की भी मदद हो सके. यही सोच उन्हें आध्यात्मिक जीवन की ओर खींच लाई.
जीवन देखने का नया नजरिया
यात्रा के अनुभव बताते हुए हरीश कहते हैं कि परिक्रमा केवल एक पैदल यात्रा नहीं बल्कि जीवन को देखने का एक नया नजरिया देती है. रास्ते में मिलने वाले लोग, उनकी सेवा, उनकी निस्वार्थ भावना, इन सबने उन्हें अंदर से बदल दिया. कई उद्योगपति, व्यापारी और साधारण लोग भी परिक्रमा वासियों की सेवा में दिन-रात लगे रहते हैं. कोई खाना खिलाता है, कोई चाय पिलाता है, कोई राहगीरों को अपने घर में रुकने का निमंत्रण देता है. यह देखकर हरीश को बड़ा आश्चर्य हुआ कि इतने लोग बिना किसी स्वार्थ के सेवा में लगे हुए हैं.
हर रोज कुछ नया सीख रहे हरीश
हरीश आगे कहते हैं कि इस यात्रा में वह रोज कुछ नया सीख रहे हैं. उन्हें समझ आ रहा है कि सुख का असली अहसास बाहरी चीजों से नहीं बल्कि भीतर से आता है. वह आगे भी नर्मदा माई की संपूर्ण परिक्रमा पूरी करना चाहते हैं ताकि इस सेवा और भक्ति से उनका जीवन और भी पवित्र और शांत हो सके. उनके अनुसार, यह निर्णय भले ही अचानक था लेकिन यह अब तक का उनका सबसे सही फैसला है.
दिल की आवाज सुनना भी जरूरी
अब हरीश नौकरी, पैसा और आरामदायक जीवन से दूर हैं लेकिन कहते हैं कि जितनी शांति और संतुष्टि उन्हें इस यात्रा में मिल रही है, वह उन्हें किसी ऑफिस, किसी पद या किसी बड़ी सैलरी में कभी नहीं मिली. वह चाहते हैं कि उनका यह अनुभव लोगों तक पहुंचे और लोग समझें कि जीवन में कभी-कभी दिल की आवाज सुनना भी जरूरी है. नर्मदा परिक्रमा की इस प्रेरक यात्रा ने हरीश को एक इंजीनियर से भक्त बना दिया. उनका मानना है कि आने वाले समय में भी वह सेवा, भक्ति और आध्यात्मिकता के इसी मार्ग पर चलते रहेंगे क्योंकि यही उनके लिए जीवन की असली कमाई है.