मोक्षदा एकादशी के दिन भूलकर भी ना करें ये काम, वरना हो सकता है बड़ा नुकसान

मोक्षदा एकादशी के दिन भूलकर भी ना करें ये काम, वरना हो सकता है बड़ा नुकसान


हिंदू धर्म में एकादशी व्रत को अत्यंत पवित्र और पुण्यफल देने वाला माना गया है. यह व्रत केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और भगवान विष्णु तथा माता लक्ष्मी की विशेष कृपा प्राप्त करने का श्रेष्ठ उपाय माना गया है. पूरे वर्ष में 24 एकादशियाँ आती है. उज्जैन के प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पंडित आनंद भारद्वाज बताते हैं कि इस बार एकादशी व्रत किस दिन पड़ रहा है. इसे एक अनुशासित तपस्या माना गया है. उनके अनुसार एकादशी का व्रत केवल उपवास का नाम नहीं है, बल्कि नियम, संयम और पूर्ण श्रद्धा के साथ की जाने वाली साधना है.

जो भी श्रद्धा और नियम से एकादशी का व्रत करता है, उसके समस्त पापों का क्षय होता है. उसे जीवन में शांति, समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति होती है. भगवान विष्णु की कृपा से जीवन में सकारात्मक ऊर्जा, मानसिक शांति और पारिवारिक सुख भी बढ़ते हैं.

किस दिन रखा जाएगा मोक्षदा एकादशी का व्रत
हिंदू पंचांग के अनुसार, इस बार मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी 30 नवंबर की रात 9 बजकर 29 मिनट से लेकर 1 दिसंबर 2025 की शाम 7 बजकर 01 मिनट बजे तक रहने वाली है. उदिया तिथि को ध्यान में रखते हुए मोक्षदा एकादशी का व्रत 1 दिसंबर को रखा जाएगा.

दोपहर में सोना या देर से उठना
व्रत के दिन आलस्य त्यागना आवश्यक है. दोपहर में सोना या देर से जागना मानसिक शुद्धि को प्रभावित करता है और शास्त्रों के अनुसार व्रत का प्रभाव कम हो जाता है.एकादशी के दिन व्रती को पूर्ण सात्विक आहार पर रहना चाहिए. लहसुन-प्याज जैसे तामसिक तत्व व्रत की पवित्रता को भंग कर देते हैं, इसलिए इनसे पूरी तरह बचना आवश्यक है.

कटु वचन और नकारात्मकता से दूरी
व्रत के दौरान मन, वाणी और व्यवहार तीनों में शुद्धता होनी चाहिए. किसी को कठोर शब्द कहना या मन में नकारात्मक विचार लाना व्रत को अपवित्र कर देता है.

पूजा की विधि और धार्मिक आचरण
पं. शुक्ला बताते हैं कि एकादशी के दिन प्रातः स्नान के बाद भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए. तुलसी दल, पीले पुष्प और पंचामृत से उन्हें भोग अर्पित करें। दिनभर भक्ति, ध्यान, जप और दान में मन लगाना श्रेष्ठ माना जाता है.

व्रत बनाएं सफल, न कि केवल प्रदर्शन
एकादशी का उद्देश्य शरीर को कष्ट देना नहीं, बल्कि मन और आत्मा को पवित्र करना है. इसलिए केवल भोजन त्यागना ही नहीं, बल्कि अपने आचरण और विचारों में सुधार लाना ही व्रत की वास्तविक सफलता है.



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