सतना. मध्य प्रदेश के सतना को स्मार्ट सिटी के रूप में विकसित करने के बड़े-बड़े दावों के बीच जब लोकल 18 ने शहर की सड़कों पर उतरकर ग्राउंड रियलिटी जानी, तो तस्वीर बिल्कुल अलग सामने आई. शहरवासियों ने खुलकर कहा कि स्मार्ट सिटी का सपना सिर्फ फाइलों और बैठकों तक सीमित है. सड़कें टूटी हुई हैं, नाले ओवरफ्लो होते हैं, धूल और गड्ढों से लोग परेशान हैं और कई प्रोजेक्ट वर्षों से अधूरे पड़े हैं. लोगों के मुताबिक, योजनाएं बन तो जाती हैं लेकिन उनका असर जमीन पर नगण्य दिखता है. प्रशासन काम प्रगति पर है कहकर अपना पक्ष तय करता है लेकिन जनता को अभी भी असली बदलाव का इंतजार है.
अधूरा पड़ा है तालाब प्रोजेक्ट
उतैली निवासी एसडी विश्वकर्मा ने कहा कि उनके आवास के पास स्मार्ट सिटी के तहत एक तालाब के विकास के लिए 877 लाख रुपये का बजट स्वीकृत हुआ था लेकिन 4–5 साल बीतने के बाद भी प्रोजेक्ट अधूरा है. काम मनमर्जी और मनचाहे अंदाज में किया जा रहा है. हालत देखकर लगता नहीं कि उनके जीवनकाल में इस तालाब का विकास हो पाएगा. उन्होंने शहर भर में महापौर के काम करने के तरीके पर भी सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि पूरे शहर की सड़कें एक साथ खुदवा दी गईं लेकिन पुरानी खुदी सड़कों को रिपेयर करने की कोई व्यवस्था नहीं की गई. स्मार्ट पार्कों की हालत भी बदहाल है और कई प्रोजेक्ट आधे-अधूरे पड़े हैं.
सतना से पलायन की मजबूरी
डालीबाबा निवासी विक्रांत ने सतना के विकास मॉडल पर सीधा प्रहार किया. उन्होंने कहा कि यहां सिर्फ गड्ढे हैं, धूल है और अव्यवस्था है, विकास कहीं नहीं दिखता. उनका कहना था कि संविधान में जो मूलभूत अधिकार जैसे स्वच्छ हवा, बेहतर सड़कें, रोजगार, कनेक्टिविटी की सतना में भारी कमी है. विक्रांत ने बताया कि वह विट्स कॉलेज में पढ़ते हैं और रोज कॉलेज जाते समय उनकी सफेद शर्ट धूल में भूरे रंग की हो जाती है. स्मार्ट सिटी होते हुए भी पढ़ने और रोजगार के लिए युवाओं को सतना से पलायन करना पड़ता है.
क्लाउड किचन चलाने वाले अंशुमान सिंह ने सरकारी प्रक्रियाओं पर तीखा हमला बोला. उन्होंने कहा कि स्मार्ट सिटी के नाम पर बहुत पैसा सतना आया लेकिन उसका सही जगह उपयोग नहीं हुआ. यदि इन फंड का ठीक से इस्तेमाल होता, तो सतना आज रीवा से भी आगे निकल सकता था. अंशुमान ने कहा कि जिले का प्रशासन और नेता पैरासाइट की तरह शहर को अंदर ही अंदर खोखला कर रहे हैं. उन्होंने उदाहरण दिया कि अपने किचन से जुड़े डॉक्यूमेंट्स बनवाने के लिए उन्हें कर्मचारियों की जेब गर्म करनी पड़ी, नहीं तो फाइल आगे बढ़ती ही नहीं. उन्होंने सीवर लाइन प्रोजेक्ट को सतना की सबसे बड़ी विफलता बताया. उनके घर के सामने खुदाई हुई थी लेकिन रिपेयर का खर्च उन्हें खुद उठाना पड़ा. अंशुमान ने कहा कि वह पुणे में अच्छी नौकरी छोड़कर सिर्फ अपने माता-पिता के कारण सतना लौटे लेकिन अब उन्हें यहां की अव्यवस्था देखकर निराशा होती है.
एजुकेशन से एयरपोर्ट तक खोखले दावे
रिटायर्ड शिक्षक आरके सिंह ने कहा कि शहर में समस्याओं की कोई कमी नहीं है. उनका कहना था कि स्मार्ट सिटी के नाम पर सतना रो रहा है. कहीं भी स्मार्टनेस दिखाई नहीं देती. उन्होंने कहा कि सतना का एयरपोर्ट प्रोजेक्ट पूरी तरह फेल साबित हुआ जबकि रीवा में अब कमर्शियल फ्लाइट्स उड़ रही हैं. साथ ही शिक्षा व्यवस्था को भी ठप बताया. वह बोले कि नए शिक्षकों की भर्ती नहीं हो रही, सरकारी स्कूलों की हालत जर्जर है और कई जगह भवन टूटने की स्थिति में हैं. अगर सतना में प्राइवेट स्कूल न हों, तो बच्चों का बौद्धिक विकास रुक सकता है.
जनता के इन कड़े सवालों और तर्कों से साफ है कि सतना में स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट कागजों से बाहर निकलकर वास्तविकता में उतरने के लिए अभी बहुत संघर्ष बाकी है. करोड़ों के बजट और बड़े दावों के बावजूद शहर की तस्वीर फिलहाल निराशजनक है. जनता अब सिर्फ वादे नहीं बल्कि जमीन पर दिखाई देने वाले बदलाव की उम्मीद कर रही है.