बाइनॉरल बीट्स… एक खास तरह का म्यूजिक…. इसमें दोनों कानों में अलग-अलग फ्रीक्वेंसी की आवाजें सुनाई देती हैं। शहर के किशोरों में अब इसकी लत भी अवसाद पैदा कर रही है। मोबाइल, ऑनलाइन गेमिंग के बाद अब यह डिजिटल एडिक्शन का नया खतरा बनकर उभर रहा है।
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विशेषज्ञों के मुताबिक, बाइनॉरल बीट्स के कारण दिमाग कंफ्यूज होकर दो अलग-अलग साउंड्स को एक बनाने की कोशिश करता है। इस दौरान दिमाग एक तीसरा साउंड बना लेता है और उससे कॉर्टीसोल का लेवल कम हो जाता है। इस कारण खुश रखने वाले मेलाटोनिन और सीरोटोनिन का स्तर बढ़ जाता है।
मनोचिकित्सकों के अनुसार, 13 से 18 साल के किशोर इसकी गिरफ्त में अधिक आ रहे हैं। 5 साल पहले 100 में से कोई 2 या 3 केस ही आते थे। अब 6-7 केस आ रहे हैं।
म्यूजिक सुनने से रोको तो आक्रामक हो रहे
कोई टोके तो खाना छोड़ देता है
17 साल का सौरभ (परिवर्तित नाम) 12वीं का छात्र है। उसे पढ़ते समय ईयरबड्स से म्यूजिक सुनने की आदत है। परिजन के मुताबिक, खाते समय भी म्यूजिक सुनता है। रोको तो खाना छोड़ देता है, लड़ने लगता है। उसके दोस्त भी नहीं हैं।
खुद काे कमरे में बंद कर लेती है
14 साल की सोनल (परिवर्तित नाम) को छत पर घूमते हुए म्यूजिक सुनने की आदत है। उसे कोई रोकता है या किसी काम के लिए कहता है तो वह गुस्सा हो जाती है और खुद को कमरे में बंद कर लेती है।
रिसर्च : 5.3% लोग सुनते हैं ऐसा संगीत ड्रग एंड एल्कोहल रिव्यू जर्नल में प्रकाशित रिसर्च के मुताबिक 30 हजार से ज्यादा लोगों पर हुए सर्वे में पता चला कि 5.3% लोग बाइनॉरल बीट्स को सुनते हैं। इनमें 34.7% मूड बदलने और 11.7% फिजिकल ड्रग्स के असर को महसूस करने के लिए ऐसा संगीत सुनते हैं।
बड़ी समस्या यह है कि पीड़ित को पता ही नहीं होता है कि उसे डिजिटल लत है। ऐसे लोगों से बात करना मुश्किल होता है। – डॉ. पवन राठी, अध्यक्ष, इंदौर सायकाइट्रिस सोसायटी
^मनोचिकित्सक के पास आने तक केस मॉडरेट लेवल तक पहुंच चुका होता है। 90% अकेलापन और अवसाद से जूझ रहे हैं। – डॉ. संजीव त्रिपाठी, क्लिनिकल चाइल्ड साइकोलॉजिस्ट एंड फैमिली थैरपिस्ट