सरकारी शिक्षक बने मिसाल! 1 साल तक स्कूलों के चक्कर, आज 332 बच्चों की जिंदगी संवार रहे मोहम्मद रफ़ीक

सरकारी शिक्षक बने मिसाल! 1 साल तक स्कूलों के चक्कर, आज 332 बच्चों की जिंदगी संवार रहे मोहम्मद रफ़ीक


मोहन ढाकले, बुरहानपुर: बुरहानपुर के बेरी मैदान क्षेत्र में रहने वाले मोहम्मद रफ़ीक की जिंदगी संघर्ष, हिम्मत और जीत की ऐसी मिसाल है, जो किसी को भी प्रेरित कर दे. 6 सितंबर 1989 को पावरलूम मज़दूर मोहम्मद इब्राहिम और तायरा बानो के घर जब रफ़ीक का जन्म हुआ, तो परिवार में खुशियां छा गईं. लेकिन डॉक्टरों ने जैसे ही बताया कि बच्चा दिव्यांग है, परिवार की दुनिया पलट गई. उन्हें लगा कि शायद रफ़ीक पढ़-लिख नहीं पाएगा, आगे नहीं बढ़ पाएगा.

लेकिन रफ़ीक के मन में शुरू से ही पढ़ने की तीव्र इच्छा थी. वे बार-बार अपने परिवार से स्कूल भेजने की जिद करते रहे. परिवार ने भी हार नहीं मानी एक साल तक वे रफ़ीक को सरकारी स्कूलों में लेकर घूमते रहे, लेकिन हर बार जवाब मिलता दिव्यांग होने की वजह से एडमिशन नहीं दिया जा सकता.

एक साल तक संघर्ष के बाद आखिरकार रास्तीपुरा में मूकबधिर विद्यालय शुरू हुआ, जहां रफ़ीक को पहली बार पढ़ने का मौका मिला. यहीं से उनकी असली उड़ान शुरू हुई. कक्षा 8 तक की पढ़ाई उन्होंने यहीं से की और कई खेल प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेकर अपनी प्रतिभा साबित की.

कक्षा 5 की बोर्ड परीक्षा में उन्होंने 92% अंक हासिल किए और बुरहानपुर में पहला स्थान पाया. खंडवा जिले में भी वे सातवें पायदान पर रहे. इसके बाद उन्होंने ब्रेल लिपि सीखकर 10वीं और 12वीं की परीक्षाएं निजी रूप से दीं. 12वीं में भी उन्होंने शानदार 75% अंक हासिल किए.

इसके बाद उन्हें सेवा सदन महाविद्यालय में बीए में नियमित प्रवेश मिला. खास बात यह रही कि ब्रेल लिपि सीखने के बाद उन्होंने सामान्य बच्चों के साथ बैठकर ही परीक्षा दी. बीए के बाद उन्होंने एमए (पॉलिटिकल साइंस) किया और फिर विशेष शिक्षा में B.Ed पूरा किया.

उनकी मेहनत का फल उन्हें 2014 में मिला, जब वे शिक्षक के रूप में सरकारी नौकरी में चयनित हुए. आज वे बुरहानपुर जिले में मोबाइल रिसोर्स कोऑर्डिनेटर के रूप में तैनात हैं और 332 दिव्यांग बच्चों की शैक्षणिक प्रगति पर निगरानी रखते हैं. जिन बच्चों को दुनिया अक्सर कमजोर समझती है, रफ़ीक उन्हें मजबूत बनाकर आगे बढ़ना सिखा रहे हैं.

माता-पिता खुद नहीं पढ़े, लेकिन बेटे को पढ़ाने का सपना पूरा किया
रफ़ीक कहते हैं कि मेरे माता-पिता कभी स्कूल नहीं गए. उन्हें पढ़ाई का ज्यादा ज्ञान नहीं था, लेकिन उन्होंने मुझे पढ़ाने के लिए दिन-रात मेहनत की. पिता पावरलूम चलाते थे, उसी कमाई से मेरी पढ़ाई हुई. आज मैं 11 साल से सरकारी नौकरी कर रहा हूं और हजारों बच्चों की जिंदगी में रोशनी ला चुका हूं.

काबिलियत ने बदल दी जिंदगी, विवाह भी हुआ सम्मान के साथ
रफ़ीक बताते हैं कि लोगों ने उनका संघर्ष देखा और उनकी काबिलियत को पहचाना. समाज ने आगे आकर उनके विवाह में भी सहयोग किया. आज उनकी शादी को एक साल हो चुका है. उनकी पत्नी पूरी तरह उनका साथ निभाती हैं.

रफ़ीक मुस्कुराते हुए कहते हैं कि मैं दिव्यांग हूं, लेकिन मेरी पत्नी मुझे कभी महसूस नहीं होने देती कि मुझमें कोई कमी है. वह रोज़ मुझे ऑफिस छोड़ने और लेने आती है. उसी के साथ से मेरी जिंदगी आसान हो गई है. मोहम्मद रफ़ीक की कहानी यह साबित करती है कि परिस्थितियाँ जैसी भी हों, हिम्मत और संकल्प इंसान को हर मंज़िल तक पहुंचा सकते हैं.



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