शिवांक द्विवेदी, सतना: सतना के हाईटेक युवा किसान अंशुमान सिंह इन दिनों जिले ही नहीं पूरे विंध्य क्षेत्र में किसानों के लिए प्रेरणा बने हुए हैं. नई सोच, आधुनिक तकनीक और जोखिम उठाने के साहस ने उन्हें पारंपरिक खेती की भीड़ से अलग खड़ा कर दिया है. जहां अधिकांश किसान मौसम की मार, कम पैदावार और लागत बढ़ने की समस्याओं से जूझ रहे हैं वहीं अंशुमान ने मचान खेती अपनाकर न सिर्फ अपनी उपज दोगुनी कर ली बल्कि पानी, मेहनत और कीटों से होने वाले नुकसान को भी कम कर दिया है. आज उनकी खेती का मॉडल तेजी से लोकप्रिय हो रहा है और ग्रामीण इलाकों में किसान इसे सीखने के लिए उनके पास पहुंच रहे हैं.
दिल्ली-पुणे की नौकरी छोड़ खेती में सफलता की नई कहानी
अंशुमान ने अपनी करियर की शुरुआत दिल्ली और पुणे जैसी मेट्रो सिटीज में जॉब से की थी. लेकिन मन हमेशा घर वापसी और खेती से ही जुड़ा रहा. खुद का व्यवसाय करने की इच्छा और ऑर्गेनिक खेती में बेहतर भविष्य देखने के बाद उन्होंने नौकरी छोड़ दी. कोठी के पास 5 एकड़ जमीन किराए पर लेकर खेती की शुरुआत की.
उनके अनुसार सतना का मौसम किसानों के लिए चुनौतीपूर्ण है क्योंकि यहां बारिश में ज़्यादा बारिश, ठंड में कड़ाके की ठंड और गर्मी में तेज़ गर्मी के कारण किसान सबसे ज़्यादा परेशान रहते हैं. इसी चुनौती से निपटने के लिए उन्होंने विकल्प तलाशे और इंटरनेट पर खोजते हुए आकाश चौरसिया की मचान खेती को समझा और यहीं से उनकी दिशा बदल गई.
3 एकड़ पारंपरिक, 2 एकड़ हाईटेक
अंशुमान लोकल 18 से कहते हैं कि वो वर्तमान में 3 एकड़ में पारंपरिक सीजनल फसलें और 2 एकड़ में मचान खेती कर रहे हैं. उन्होंने बताया कि मचान खेती से एक ही जगह पर 7-8 प्रकार की फसलें उगाई जा सकती हैं इसलिए यह कम जगह में ज्यादा उत्पादन का बेहतरीन तरीका है. अब वह इसे पूरे 5 एकड़ में लागू करने की योजना बना रहे हैं.
कैसे तैयार होती है मचान खेती?
अंशुमान बताते हैं कि इसका स्ट्रक्चर बेहद सरल है. सबसे पहले 4×4 फीट की दूरी पर बांस गाड़े जाते हैं, चारों ओर जीआई तार बांधी जाती है. नीचे 2–2 फीट के बेड बनते हैं. बेड में हल्दी और अदरक 7–8 इंच नीचे जाती है. ऊपर की सतह पर बेल वाली फसलें जैसे खीरा, करेला, लौकी, तोरई और कद्दू बहुत तेजी से बढ़ती हैं. नीचे की लेयर में पालक, मेथी, धनिया, मूली और प्याज़ जैसी फसलें उगती हैं. यह मल्टीलेयर फार्मिंग पौधों की ग्रोथ और हेल्थ दोनों को बेहतर बनाती है. एक पौधे से निकलने वाली प्राकृतिक गैसें दूसरे पौधे के लिए लाभकारी होती हैं.
कम लागत, अधिक मुनाफा
अंशुमान कहते हैं ये एक बार का सेटअप है, लेकिन रिटर्न शानदार है. इसमें ड्रिप से पानी की बचत कर सकते हैं साथ ही कीटों का कम अटैक होता है. वहीं उत्पादन में बढ़ोतरी होती है और एक ही जमीन से कई गुना आय भी मिलती है. ठंड के मौसम में खीरा 30-40 दिन में तैयार हो जाता है, मेथी 25-30 दिन में और पालक-मूली 35–40 दिन में. यानी कम समय में आपको पैदावार मिलना चालू हो जाती है.
अंशुमान का यह प्रयास सतना में खेती का मॉडल बदल रहा है. कई किसान उनकी मचान खेती देखने आ रहे हैं और खुद इसे अपनाने की तैयारी में हैं. वहीं गांवों में यह नई खेती तकनीक तेजी से लोकप्रिय हो रही है.