badminton shuttlecock history: बैडमिंटन एक फेमस खेल है, जिसके करोड़ों दीवाने हैं. दुनियाभर के 160 देशों में इसे खेला जाता है. चीन, इंडोनेशिया, भारत, मलेशिया, डेनमार्क और जापान जैसे देश इस खेल में दबदबा रखते हैं, लेकिन हम यहां इस खेल के बारे में नहीं बल्कि उस चीज के बारे में बात करेंगे, जिसके बारे में पता तो सभी को होगा, लेकिन शायद आप ये नहीं जानते होंगे कि आखिर वो आई कहां से, बनती कैसे है और उसका इतिहास क्या है…? यहां जिस चीज की बात हो रही वो है इस खेल की ‘जान’ यानी शटलकॉक. कुछ लोग इसे चिड़िया भी कहते हैं. शटलकॉक के बिना बैडमिंटन खेल अधूरा है.
शटलकॉक के बारे में हम डिटेल से जानेंगे, उससे पहले यहां आपको ये बताना जरूरी है कि बैडमिंटन खेल का इतिहास 2 हजार साल पुराना माना जाता है, लेकिन इसे खेल के तौर पर सबसे पहली बार 1873 में पेश किया गया था. इंग्लैंड में ड्यूक ऑफ ब्यूफोर्ट ने इस खेल को ‘बैडमिंटन’ नाम दिया था. फिर आया साल 1899, ये वही साल था जब पहली ‘ऑल इंग्लैंड ओपन बैडमिंटन चैंपियनशिप’ हुई. फिर 1934 में अंतर्राष्ट्रीय बैडमिंटन महासंघ (IBF) की स्थापना हुई, जिसने इस खेल को वैश्विक मंच दिया, नतीजा ये हुआ कि आज ये खेल लगभ पूरी दुनिया में फेमस है. अब लौटते हैं शटलकॉक पर, जिसे 16 पंखों वाली चिड़िया भी कहा जाता है.
शटलकॉक दिखने में हल्की होती है. इसके पीछे इतिहास, विज्ञान और कारीगरी का अनोखा मेल छिपा है. यहां आपको बताना जरूरी है कि बैडमिंटन शटलकॉक का इतिहास करीब 2000 साल पुराना है, जिसका सफर चीन से शुरू होते हुए भारत पहुंचा और फिर इंग्लैंड. शटलकॉक को बड़ी सावधानी से बनाया जाता है, क्योंकि इसे बनाने के दौरान इसकी उड़ान और संतुलन को ध्यान में रखा जाता है. कुछ खास कारीगर ही इसे बनाते हैं.
बैडमिंटन शटलकॉक क्या होती है?
शटलकॉक बैडमिंटन गेम का अहम हिस्सा है. इसके बिना ये खेल संभव नहीं. शटलकॉक का निचला हिस्सा गोल और भारी होता है. उसके ऊपर की ओर पंख या फिर सिंथेटिक स्कर्ट लगी रहती है. डिजाइन करते वक्त ये ध्यान रखा जाता है कि जब रैकेट से उसे मारा जाए तो वो हवा में स्थिर और नियंत्रित तरीके से उड़ सके.
आखिर कहां से आई शटलकॉक?
इतिहास खंगालने पर पता चलता है कि शटलकॉक का शुरुआती रूप प्राचीन चीन में दिखा था. वहां ‘जियानजी’ नाम का खेल खेला जाता था, जिसमें पंखों वाली वस्तु को पैरों से उछाला जाता था. फिर यूरोप में ‘बैटलडोर एंड शटल’ नाम का खेल फेमस हुआ, जिसमें एक छोटे रैकेट से पंखों वाली शटल को हवा में रखा जाता था, जबकि भारत में इसे ‘पूना’ खेल के नाम से जाना गया, जो ब्रिटिश अधिकारियों के बीच काफी पसंद आया, जिसे बाद में अंग्रेज इंग्लैंड ले गए, जहां उसे ‘बैडमिंटन’ नाम मिला.
2 प्रकार की होती है बैडमिंटन शटलकॉक?
मौजूदा दौर में बैडमिंटन शटलकॉक मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है. पहली है फेदर शटलकॉक (Feather Shuttlecock), जो असली पंखों से बनाई जाती है. प्रोफेशनल और इंटरनेशनल खिलाड़ी इसी का यूज करते हैं. दूसरी होती है नायलॉन या प्लास्टिक शटलकॉक, जो सिंथेटिक मटीरियल से तैयार की जाती है. इसे आमतौर पर स्कूल और क्लब स्तर पर यूज में लिया जाता है.
आखिर किस चीज से बनती है बैडमिंटन शटलकॉक?
अब सबसे बड़ा सवाल ये है कि आखिर बैडमिंटन शटलकॉक बनती कैसे है? तो जान लीजिए कि फेदर शटलकॉक बत्तख या हंस के पंखों से बनती है, जिसमें कुल 16 असली पंख लगे होते हैं. उसके नीचे का हिस्सा प्राकृतिक कॉर्क से बना होता है. कॉर्क पर ऊपर से पतली चमड़े की परत भी चढ़ाई जाती है. 16 पंख होने से यह हवा में सबसे बेहतर कंट्रोल और सटीक उड़ान देती है. यही वजह है कि प्रोफेशनल खिलाड़ियों की पहली पसंद है. अगर इसकी कमियों की बात करें तो बत्तख या हंस के पंखों से बनी शटलकॉक कम टिकाऊ होती है और महंगी होती है. वहीं नायलॉन या प्लास्टिक शटलकॉक सिंथेटिक मटीरियल से बनाई जाती है, जिसमें नायलॉन या प्लास्टिक स्कर्ट होता है. इनमें नीचे रबर या सिंथेटिक कॉर्क बेस होता है. यह ज्यादा टिकाऊ होती है और सस्ती मिलती है, लेकिन इसका हवा में कंट्रोल फेदर शटलकॉक जैसा नहीं होता.
बैडमिंटन शटलकॉक कैसे बनाई जाती है?
फेदर शटलकॉक बनाने की प्रोसेस टफ होती है. इसमें बड़ी सावधानी बरती जाती है. इसके लिए बत्तख या हंस के बाएं पंख चुने जाते हैं. फिर पंखों की कटाई और सफाई होती है. सभी पंखों को एक लंबाई में काटकर तैयार किया जाता है. फिर गोल कॉर्क बेस बनाया जाता है, जो प्राकृतिक या सिंथेटिक कॉर्क से तैयार किया जाता है. फिर उस पर चमड़े की परत चढ़ाई जाती है. प्रोसेस के दौरान कॉर्क में 16 छेद किए जाते हैं. पंखों को सही कोण पर फिट किया जाता है. फिर धागे से बांधा जाता है, ताकि मजबूती मिल सके. इसके बाद शटलकॉक की स्पीड, बैलेंस और उड़ान की जांच होती है. सबकुछ सही आने पर ही इसे फाइनल किया जाता है.
भारत में शटलकॉक कहां बनती है?
भारत में शटलकॉक को खासकर 2 बड़े शहरों में बनाया जाता है. पहला है यूपी का मेरठ, जिसे देश का सबसे बड़ा शटलकॉक निर्माण केंद्र कहा जाता है और दूसरा है पश्चिम बंगाल का हावड़ा, जादुरबेरिया. इनके अलावा हैदराबाद और नागपुर भी अब इसे बनाने की रेस में शामिल हो रहा है. खास बात ये है कि भारत में बनी शटलकॉक दुनिया के कई देशों में एक्सपोर्ट भी होती है.