ना चाहते हुए भी हर मैच में प्लेइंग-11 क्यों बदलती है साउथ अफ्रीका टीम? 90% फैंस नहीं जानते होंगे बड़ी वजह

ना चाहते हुए भी हर मैच में प्लेइंग-11 क्यों बदलती है साउथ अफ्रीका टीम? 90% फैंस नहीं जानते होंगे बड़ी वजह


South Africa Cricket Team: साउथ अफ्रीका की क्रिकेट टीम इस समय भारत दौरे पर है. तीन मैचों की टेस्ट शृंखला में टेम्बा बावुमा की अगुवाई वाली टीम ने 2-0 से सीरीज जीतकर इतिहास रचा था. उसके बाद तीन मैचों की एकदिवसीय शृंखला खेली गई, जहां भारत ने 2-1 से बाजी मारी. अब दोनों देशों के बीच 5 मैचों की T20I सीरीज खेली जा रही है. रविवार को धर्मशाला में हुए तीसरे मुकाबले में भारत ने साउथ अफ्रीका को 7 विकेट से हराकर 2-1 की बढ़त हासिल कर ली है. 

भारत के खिलाफ धर्मशाला में खेले गए तीसरे T20I में साउथ अफ्रीका की प्लेइंग इलेवन देख फैंस को झटका लगा. बिना किसी वजह के 3 खिलाड़ियों को बाहर कर दिया गया, जिसमें डेविड मिलर का नाम भी शामिल था. फैंस को समझ नहीं आया कि पिछले मैच में मिली जीत के बावजूद प्रोटियाज को प्लेइंग इलेवन में इतने बदलाव करने की जरूरत क्यों पड़ी. 

प्लेइंग 11 बदलने को क्यों मजबूर साउथ अफ्रीका?

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धर्मशाला में खेले गए मैच के दौरान पूर्व भारतीय क्रिकेटर और वर्तमान में कमेंट्री कर रहे रॉबिन उथप्पा ने इस सस्पेंस पर से पर्दा उठाया. उन्होंने कमेंट्री के दौरान इस अहम मुद्दे पर बात की और बताया कि क्यों ना चाहते हुए भी साउथ अफ्रीकी टीम को हर मैच में प्लेइंग इलेवन में बदलाव करना पड़ता है. 

रॉबिन उथप्पा ने समझाते हुए कहा, ”बहुत लोगों को ये जानकारी नहीं होगी कि साउथ अफ्रीका क्रिकेट में ब्लैक कम्युनिटी (अश्वेत समुदाय) के लिए अलग कानून बनाया गया है. जिसके तहत हर मैच में 11 में से 5 अश्वेत समुदाय के खिलाड़ियों को खिलाना अनिवार्य है. साल के अंत में इसका औसत निकाला जाता है, जहां देखा जाता है कि इस साल औसतन  5 अश्वेत खिलाड़ी खेले हैं या नहीं.”

रॉबिन उथप्पा ने कमेंट्री के दौरान आगे कहा कि अगले साल फरवरी-मार्च में टी20 वर्ल्ड कप 2026 का आयोजन होना है. इस लिहाज से देखें तो साउथ अफ्रीकी टीम काफी मजबूत है और वो ये नहीं चाहते कि उस मेगा इवेंट में वो इस कानून के कारण अपने मजबूत खिलाड़ियों को मैदान पर नहीं उतार सके. यही वजह है कि बाइलेटरल सीरीज में वो प्लेइंग इलेवन में लगातार फेरबदल करते हैं.

क्या कहता है ‘ब्लैक कोटा’ कानून?

एक सीजन में प्लेइंग इलेवन में औसतन पांच अश्वेत खिलाड़ी (जिनमें कम से कम दो अश्वेत अफ्रीकी शामिल हों) होने चाहिए, लेकिन जरूरी नहीं कि हर मैच में हों. इसके पीछे का उद्देश्य ये है कि ऐतिहासिक असंतुलनों को दूर करने और यह सुनिश्चित करने के लिए कि क्रिकेट दक्षिण अफ्रीका की विविध आबादी को प्रतिबिंबित करे, जहां अश्वेत अफ्रीकी देश की लगभग 80% आबादी बनाते हैं.

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