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उज्जैन सिंहस्थ क्षेत्र में लागू लैंड पूलिंग एक्ट को राज्य सरकार ने पूरी तरह निरस्त कर दिया है. विधायकों और भारतीय किसान संघ के लगातार विरोध के बाद नई अधिसूचना जारी की गई. सरकार ने पुराने आदेश भी रद्द कर दिए हैं. किसानों ने इसे आंदोलन की बड़ी जीत बताया है.
रमाकांत दुबे
भोपाल/उज्जैन. राज्य सरकार ने उज्जैन सिंहस्थ क्षेत्र में जमीनों के स्थायी अधिग्रहण को लेकर लागू किए गए लैंड पूलिंग एक्ट को आखिरकार पूरी तरह निरस्त कर दिया है. सरकार ने इस संबंध में नई अधिसूचना जारी कर स्पष्ट किया है कि उज्जैन जिले में सिंहस्थ से जुड़ी सभी लैंड पूलिंग योजनाएं अब प्रभावहीन रहेंगी. इसके साथ ही वे पुराने आदेश भी रद्द कर दिए गए हैं, जिनसे किसानों और जमीन मालिकों के बीच लगातार भ्रम और असमंजस की स्थिति बनी हुई थी. यह फैसला लंबे समय से चल रहे राजनीतिक दबाव और किसान संगठनों के विरोध के बाद सामने आया है.
सिंहस्थ लैंड पूलिंग एक्ट को लेकर सरकार को लगातार विधायकों, किसान संगठनों और स्थानीय जनप्रतिनिधियों की नाराजगी का सामना करना पड़ रहा था. भारतीय किसान संघ ने इसे किसानों के अधिकारों पर सीधा हमला बताया था. संगठन ने स्पष्ट कर दिया था कि यदि सरकार ने फैसला वापस नहीं लिया तो प्रदेशव्यापी आंदोलन किया जाएगा. इसी दबाव के बीच सरकार ने यह कदम उठाते हुए लैंड पूलिंग एक्ट को पूरी तरह समाप्त करने का निर्णय लिया.
मध्य प्रदेश सरकार ने नई अधिसूचना जारी कर दी है.
क्या था सिंहस्थ लैंड पूलिंग एक्ट
सिंहस्थ महाकुंभ की तैयारियों के नाम पर उज्जैन क्षेत्र में लैंड पूलिंग की योजना लागू की गई थी. इसके तहत सिंहस्थ क्षेत्र में आने वाली निजी कृषि भूमि को विकास के नाम पर एकत्र कर सरकारी नियंत्रण में लाने की व्यवस्था बनाई गई थी. किसानों को बदले में विकसित भूखंड देने का प्रावधान बताया गया था. लेकिन जमीनी स्तर पर किसानों को आशंका थी कि यह योजना आगे चलकर स्थायी अधिग्रहण का रूप ले सकती है. इसी वजह से शुरू से ही इसका विरोध होता रहा.
विधायकों की आपत्ति ने बढ़ाया दबाव
लैंड पूलिंग को लेकर केवल किसान संगठन ही नहीं, बल्कि सत्ताधारी दल के कई विधायक भी खुलकर सामने आ गए थे. विधायकों ने सरकार को अवगत कराया था कि इस योजना से ग्रामीण इलाकों में भारी असंतोष है. विधायकों का तर्क था कि सिंहस्थ जैसे धार्मिक आयोजन के नाम पर किसानों की पुश्तैनी जमीनों के साथ किसी भी तरह का प्रयोग स्वीकार्य नहीं होगा. इस राजनीतिक दबाव ने सरकार की परेशानी और बढ़ा दी थी.
भारतीय किसान संघ की चेतावनी निर्णायक बनी
भारतीय किसान संघ ने लैंड पूलिंग के विरोध में 26 दिसंबर से ‘आर-पार की लड़ाई’ का ऐलान किया था. संगठन ने साफ कहा था कि जब तक सरकार फैसला वापस नहीं लेती, तब तक आंदोलन जारी रहेगा. संघ ने उज्जैन कलेक्टर कार्यालय के बाहर स्थायी ‘घेरा डालो, डेरा डालो’ आंदोलन की घोषणा की थी. इसमें 18 जिलों से किसान अपने परिवार और पशुओं के साथ उज्जैन पहुंचने वाले थे. इसे प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती माना जा रहा था.
रविवार की बैठक में सरकार पर आरोप
भारतीय किसान संघ की रविवार को हुई अहम बैठक में प्रदेश अध्यक्ष कमल सिंह आंजना ने सरकार पर वादाखिलाफी का आरोप लगाया था. उन्होंने कहा था कि लैंड पूलिंग के नाम पर किसानों को भरोसे में लिया गया, लेकिन बाद में शर्तें बदल दी गईं. बैठक में यह भी कहा गया था कि यह आंदोलन केवल उज्जैन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे प्रदेश में फैलाया जाएगा.
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सुमित वर्मा, News18 में 4 सालों से एसोसिएट एडीटर पद पर कार्यरत हैं. बीते 3 दशकों से सक्रिय पत्रकारिता में अपनी अलग पहचान रखते हैं. देश के नामचीन मीडिया संस्थानों में सजग जिम्मेदार पदों पर काम करने का अनुभव. प…और पढ़ें