मध्य प्रदेश और राजस्थान की सीमा पर बसे छोटे से गांव सेमली से निकलकर इंदौर तक अपनी अलग पहचान बनाने वाले राजेंद्र धनौटिया आज किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं. इंदौर में अगर कोई चाय आज युवाओं की जुबान पर सबसे ज्यादा चढ़कर बोल रही है, तो वह है उत्साह आयुर्वेदिक चाय. एक घूंट लेते ही इसकी खुशबू और स्वाद ऐसा एहसास देता है कि जैसे थकान सच में कहीं गायब हो गई हो.
राजेंद्र धनौटिया की कहानी भी उतनी ही खास है, जितनी उनकी चाय. बहुत कम लोग जानते हैं कि राजेंद्र नवोदय विद्यालय से 12वीं कॉमर्स में टॉपर रहे हैं. पढ़ाई में अव्वल होने के बावजूद उनका सपना नौकरी का नहीं, बल्कि अपना कुछ करने का था. इसी जिद के साथ वे पढ़ाई पूरी करने के बाद इंदौर आ गए.
शुरुआत आसान नहीं थी. इंदौर स्टेशन के बाहर उन्होंने पहले झाड़ू-पोंछा और छोटे-मोटे काम किए. धीरे-धीरे हालात सुधरे और उन्होंने एक छोटी सी चाय की दुकान खोल ली. शुरुआत में वे सामान्य चाय बनाते थे, लेकिन लोगों को उनके हाथ की चाय कुछ ज्यादा ही पसंद आने लगी. यहीं से उनके मन में कुछ नया करने का विचार आया.
राजेंद्र बताते हैं कि भारतीय संस्कृति और आयुर्वेद से जुड़ाव ने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी. इसी सोच से उन्होंने एक खास आयुर्वेदिक चाय तैयार की और नाम रखा उत्साह चाय. उनका नारा है जो थकान को ताकत में बदल दे, वही उत्साह है.
इस चाय में खास आयुर्वेदिक सामग्री डाली जाती है, जैसे तुलसी, काली मिर्च, लेमन ग्रास, स्टीविया, लौंग और कुछ गुप्त मसाले. इन सबका संतुलन ही इस चाय को खास बनाता है. राजेंद्र बताते हैं कि घर पर भी ऐसी चाय बनाई जा सकती है, लेकिन एक बात का खास ध्यान रखें पुरानी अदरक का इस्तेमाल करें और उसे तुरंत कूटकर चाय में डालें, ताकि उसका पूरा अरोमा बना रहे.
आज उत्साह चाय सिर्फ एक स्टॉल तक सीमित नहीं है. इंदौर के विजय नगर, स्कीम नंबर 78, कई मॉल्स समेत 5 से ज्यादा जगहों पर इसके स्टॉल हैं. राजेंद्र करीब 300 से ज्यादा लोगों को रोजगार दे रहे हैं. उनकी चाय की दीवानगी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक स्टॉल पर रोजाना 350 लीटर दूध की चाय बिक जाती है और 7 हजार से ज्यादा लोग एक ही दिन में उनकी चाय पी जाते हैं.
इतना ही नहीं, राजेंद्र ने रिलायंस स्टोर्स के साथ भी टाईअप किया है. वे एक सर्टिफाइड योगा टीचर भी हैं और बाबा रामदेव को अपनी प्रेरणा मानते हैं. समय निकालकर वे लोगों को मुफ्त योग सिखाते हैं. उनका कहना है कि चाय तन की सुस्ती भगाती है और योग मन की. राजेंद्र मानते हैं कि इस मुकाम तक पहुंचने के लिए उन्हें ताने भी सुनने पड़े, छोटी-छोटी जगहों पर काम भी करना पड़ा, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी. आज उनकी कहानी हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा बन चुकी है.