36 घंटे की ड्यूटी, दबाव, क्या डॉक्टर की मेंटल हेल्थ अनदेखी? एमपी में जान बचाने वाले खुद हार रहे जिंदगी की जंग

36 घंटे की ड्यूटी, दबाव, क्या डॉक्टर की मेंटल हेल्थ अनदेखी? एमपी में जान बचाने वाले खुद हार रहे जिंदगी की जंग


शिवकांत आचार्य/भोपाल. चाहे एम्स भोपाल की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ.रश्मि वर्मा के आत्महत्या के प्रयास हो या गांधी मेडिकल कालेज में जूनियर डाक्टर बाला सरस्वती की आत्महत्या करने का मामला. इन दोनों घटनाओं ने मेडिकल इमरजेंसी से आगे बढ़कर सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए हैं. इससे पहले शहर के बड़े सरकारी अस्पताल हमीदिया हो या एम्स लगातार सामने आ रहे ये मामले पूछते हैं कि क्या डॉक्टरों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर सरकार और स्वास्थ्य तंत्र वाकई गंभीर है?

एम्स भोपाल की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ.रश्मि वर्मा का मामला गंभीर बना हुआ है. बताया जा रहा है कि यह घटना केवल एक व्यक्तिगत संकट नहीं, बल्कि कार्यस्थल पर बढ़ते दबाव, लंबे ड्यूटी आवर्स और मानसिक तनाव की ओर भी इशारा करती है. डॉ. रश्मि वर्मा ने तो खुद को खत्म करने के लिए अपने आप को एनेस्थीसिया का डबल डोज लिया. इससे 7 मिनट उनका दिल तक नहीं धड़का और ब्रेन में ऑक्जीजन के न पहुंचने से अब वे वेंटिलेटर सपोर्ट पर हैं. उनका ब्रेन गंभीर रूप से डैमेज हुआ है. उनकी हालत में कब सुधार होगा डॉक्टर यह साफतौर पर नहीं बता पा रहे हैं.

दवाब से परेशान थी डॉ. रश्मि
बताया जा रहा है कि डॉ. रश्मि ने काम के दबाव से परेशान होकर खुदकुशी की कोशिश की है. इस मामले को एम्स प्रशासन और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने भी गंभीरता से लिया है. घटना के बाद HOD डॉ. मोहम्मद यूनुस को पद से हटा दिया गया है. इससे करीब 2 साल पहले गांधी मेडिकल कालेज में जूनियर डाक्टर बाला सरस्वती ने अपने घर पर फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी. उनके पति का भी आरोप था कि बाला सरस्वती से 36 घंटे काम कराया जा रहा था.

ये मामले उठाते हैं सवाल?
लगातार दो बड़े सरकारी संस्थानों से जुड़े ये मामले सवाल उठाते हैं कि क्या डॉक्टरों के लिए पर्याप्त काउंसलिंग, मेंटल हेल्थ सपोर्ट और सुरक्षित कार्य-परिस्थितियां मौजूद हैं? लगातार सामने आ रही ये घटनाएं बेहद दुखद हैं और गंभीर सवाल खड़े करती हैं. डॉक्टर बनने में व्यक्ति की वर्षों की मेहनत होती है, सरकार और समाज का बड़ा निवेश होता है. ऐसे में किसी युवा और काबिल डॉक्टर का इस तरह जाना पूरे समाज के लिए नुकसान है. डॉक्टरों का काम बेहद जिम्मेदारी भरा होता है, वे रोज लोगों की जिंदगी से जुड़े फैसले लेते हैं, ऐसे में मानसिक संतुलन और वर्क-लाइफ बैलेंस बहुत जरूरी है.

ये हो सकते हैं कारण
प्राथमिक तौर पर जो बातें सामने आ रही हैं उनमें वर्कलोड ज्यादा होना, प्रोफेशनल प्रेशर और कार्यस्थल का तनावपूर्ण माहौल शामिल है. मेडिकल फील्ड में सीनियर-जूनियर हायरार्की और परफॉर्मेंस का दबाव भी मानसिक तनाव बढ़ाता है. हर व्यक्ति की पर्सनैलिटी और सामाजिक परिस्थितियां अलग होती हैं, इसलिए कुछ लोग लंबे समय तक ऐसे दबाव नहीं झेल पाते और मानसिक समस्याओं के जोखिम में आ जाते हैं.

क्या है समाधान?
इसका स्थायी समाधान जरूरी है. सीनियर क्लीनिकल साइक्लोजिस्ट डॉ.राहुल शर्मा कहते हैं कि संस्थानों में ऐसा माहौल बने जहां डॉक्टर खुलकर अपनी बात रख सकें, उनकी सुनी जाए और जरूरत पड़ने पर वैकल्पिक व्यवस्थाएं की जाएं. अगर किसी के व्यवहार में बदलाव, ज्यादा तनाव या डिप्रेशन के लक्षण दिखें तो उसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. बातचीत बहुत जरूरी है और समय रहते उन्हें मेंटल हेल्थ केयर सर्विसेज से जोड़ना चाहिए.

भोपाल की ये घटनाएं चेतावनी हैं कि अगर सिस्टम ने वक्त रहते ध्यान नहीं दिया, तो इसका खामियाजा वही लोग भुगतेंगे जो दूसरों की जान बचाने में जुटे रहते हैं. सवाल साफ है कि डॉक्टरों के मानसिक स्वास्थ्य पर ठोस कदम कब उठाए जाएंगे?



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