परिवार छोड़ जर्मनी के एड्रियन बन गए अच्युतानंद, वृंदा परिवार नाम से चला मिशन

परिवार छोड़ जर्मनी के एड्रियन बन गए अच्युतानंद, वृंदा परिवार नाम से चला मिशन


इंदौरः जोर जोर से वंदे मातरम और भारत माता के जयकारे लगाते और भगवत गीता के श्लोक पढ़ते हुए हमें एक शख्स दिखाई दिए. दिखने में वह किसी पश्चिमी देश के नागरिक लग रहे थे बातचीत में पता चला कि वह जर्मनी के हैं और अपना सब कुछ छोड़कर अपना जीवन भगवान कृष्ण को समर्पित कर चुके हैं.

एक तरफ जहां पश्चिमी सभ्यता और संपन्नता युवाओं को उपयोग कीजिए वही जर्मनी के एक नागरिक एड्रियन ब्रूनिंग ‌कई सालों पहले अपना सब कुछ छोड़कर सनातन के प्रति समर्पित हो गए. वह कृष्ण भक्ति में ऐसा लीन हुए कि उन्होंने विश्व भर में इसके प्रचार का बीड़ा उठा लिया और अपनी पूरी पहचान को मिटाकर आचार्य अच्युतानंद स्वामी बन गए.

50 साल पहले आया था वृंदावन

लोकल 18 से बातचीत में उन्होंने बताया कि सन 1975 में वह पहली बार वृंदावन आए थे तब से ही लगातार सनातन के लिए काम कर रहे हैं, दुनिया के कई देशों में जाकर उन्होंने समातन के प्रचार प्रसार के लिए काम किया है. उनका कहना है कि वह अपने जीवन का जितना भी समय बचा है उसे वृंदावन में रहकर ही काटना चाहते हैं, वह यहां पर गो सेवा करते हैं भगवान कृष्ण का गुणगान करते हैं. इसी दौरान वो मथुरा में जन्मभूमि पर कृष्ण भगवान के मंदिर की भी मांग करते हैं और कहते हैं कि वहां पर भगवान के मंदिर के अलावा कुछ और नहीं होना चाहिए.

जब लोकल18 ने पूछा कि ऐसी क्या चीज थी जिसकी वजह से सब कुछ छोड़कर उन्होंने अपना जीवन सनातन को समर्पित कर दिया तो आचार्य अच्युतानंद कहते हैं की भागवत गीता का संदेश की सभी जीवों को मिलकर प्रेम भाव से साथ रहना चाहिए, सभी समान है. वह ईश्वर जिन्होंने हमें बनाया, भगवान कृष्ण और सनातन संस्कृति सेबो काफी प्रभावित हुए और अपने गुरुओं के साथ इस मिशन में उनका हिस्सा बन गए.

वृंदा परिवार नाम से चला रहे मिशन

वह 1998 से ही वृंदा परिवार नाम से एक मिशन चला रहे हैं, जिसमें वो ब्रज मंदिर, यमुना घाट समेत अनेक जगहों पर सामाजिक कार्य‌ करते हैं और लोगों को गौ सेवा के लिए प्रेरित करते हैं. उन्होंने वृंदावन और उसके आसपास के क्षेत्रों में बीमार, घायल और असहाय गायों की सेवा को अपना प्राथमिक कर्तव्य बनाया है. साथ ही वो सनातन धर्म और संस्कृति को बचाने के लिए भारत में और विश्वभर में काम कर रहे हैं. उनका‌ मानना है कि सनातन केवल एक धर्म नहीं, बल्कि जीवन जीने की वह कला है जो पूरी दुनिया को शांति का मार्ग दिखा सकती है. वो वृंदावन में घूमते हुए  यूरोप और अन्य देशों से आने वाले पर्यटकों को वैदिक दर्शन और कृष्ण लीला समझाते हैं.

हमने उनसे कृष्ण भक्ति में लीन होने और उससे पहले के जीवन के बारे में भी बात करने की कोशिश की लेकिन उनका कहना था कि वह अपने निजी जीवन को पूरी तरह भूला चुके हैं और अपनी पुरानी यादों को भी मिटा चुके हैं। उनका अपना कुछ नहीं है जो दिया है कृष्ण का ही दिया हुआ है और भागवत गीता ही परम सत्य है.



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