अनुज गौतम, सागर: कहते हैं अगर सोच साफ हो, मेहनत सच्ची हो और धैर्य बना रहे, तो खेती भी किस्मत बदल सकती है. सागर जिले के भापेल गांव के किसान कल्याण सिंह ठाकुर ने यह बात जमीन पर उतार कर दिखा दी. करीब 28 साल पहले उन्होंने अपनी खेती का तरीका बदला और जैविक खेती की राह पकड़ ली. उसी दौरान अपनी जमीन के एक हिस्से में अमरूद का बगीचा लगाया, जो आज बिना ज्यादा खर्च के हर साल उन्हें लाखों की आमदनी दे रहा है.
कल्याण सिंह ठाकुर ने उस वक्त यह फैसला लिया, जब ज्यादातर किसान रासायनिक खेती पर निर्भर थे. उन्होंने गोबर की खाद, देसी तरीकों और प्राकृतिक संसाधनों से खेती शुरू की. खास बात यह रही कि उन्होंने एक ही जमीन से दो तरह का फायदा लेने का मॉडल अपनाया. अमरूद के पेड़ों के बीच खाली जगह में गेहूं, आलू और चारे की फसल बोई जाती है. यानी फल भी और अनाज भी, दोनों से कमाई.
आज यह परंपरा उनके बेटे और नाती आगे बढ़ा रहे हैं. करीब 5 एकड़ में पूरी तरह से स्थायी जैविक खेती की जा रही है. खेत में अमरूद और नींबू के पेड़ हैं, साथ ही गेहूं, आलू और बरसीम की फसल भी. खाद के लिए घर में 28 गाय हैं, जिनके गोबर से पंचगव्य, जीवामृत, निर्मास्त्र और केंचुआ खाद तैयार की जाती है.
श्याम सुंदर ठाकुर बताते हैं कि उनके दादाजी ने करीब 11 साल पहले अमरूद का बगीचा लगाया था. तीन-चार साल में पेड़ों में फूल आने लगे और पांचवें साल से फल मिलने शुरू हो गए. पिछले 6 साल से लगातार अच्छी फसल मिल रही है. अमरूद वैसे तो साल में दो बार आता है, लेकिन बारिश के मौसम में कीड़े लगने और दाम कम मिलने की समस्या रहती है. इसलिए परिवार दिसंबर में आने वाली फसल पर ही फोकस करता है, जिसमें न कीट लगते हैं और न ही दाम की परेशानी होती है.
शुरुआत में 10-20 किलो से शुरू हुई पैदावार आज रोजाना डेढ़ से दो क्विंटल तक पहुंच चुकी है. करीब एक महीने तक लगातार तुड़ाई होती है. सिर्फ दो एकड़ से अमरूद की खेती में पिछले तीन-चार साल से हर साल 2 से 3 लाख रुपये का शुद्ध मुनाफा मिल रहा है. इसके साथ बीच की जमीन से गेहूं और दूसरी फसल का फायदा अलग.
श्याम बताते हैं कि फलदार पौधों में एक-दो साल मेहनत ज्यादा होती है, लेकिन बाद में केवल पानी और साल में एक-दो बार गोबर की खाद डालनी पड़ती है. खर्च नाममात्र का होता है, सिर्फ तुड़ाई और मंडी तक ले जाने का. उनका कहना है कि जहां गेहूं से मुश्किल से 70–80 हजार की आमदनी होती है, वहीं फलों की खेती बिना बड़ी लागत के कहीं ज्यादा फायदा देती है.