Explainer: देश का अफीम बेल्ट क्यों चर्चाओं में, क्यों इस पर होने लगी अब सख्ती

Explainer: देश का अफीम बेल्ट क्यों चर्चाओं में, क्यों इस पर होने लगी अब सख्ती


खबर ये है कि जबलपुर हाईकोर्ट के एक फैसले के बाद मध्य प्रदेश की अफीम बेल्ट चर्चा में है. इसमें मप्र पुलिस ने एक टॉपर छात्र को अवैध अफीम रखने के आरोप में फंसाने की कोशिश की, जो कोर्ट में फर्जी निकला. इसमें 6 पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया गया. अब इसके बाद इस अफीम बेल्ट की ज्यादा निगरानी और तस्करी रोकने के लिए ज्यादा सख्ती की खबर आ रही है. दरअसल मप्र में एक खास बेल्ट में देश की 80 फीसदी अफीम पैदा की जाती है. तो इससे जुड़ी दूसरी गलत प्रवृतियां भी फलफूल रही हैं.

मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र को भारत की बड़ी अफीम बेल्ट माना जाता है, जिसमें मंदसौर, नीमच और रतलाम जैसे जिले शामिल हैं, इस क्षेत्र को अगर राजस्थान के मेवाड़ (प्रतापगढ़, चित्तौड़गढ़) और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों के साथ जोड़ दें तो देश की 85% वैध अफीम इस बेल्ट में पैदा की जाती है. दरअसल यहां खसखस की पैदावार होती है, जो फिर अफीम के तौर पर प्रोसेस की जाती है.,

दिसंबर 2025 तक की खबरों के अनुसार, इस बेल्ट पर सख्ती बढ़ाई जा रही है. केंद्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो (सीबीएन) और पुलिस की ओर से छापेमारी, गिरफ्तारियां और लाइसेंस सस्पेंशन जैसे कदम उठाए जा रहे हैं.

सवाल – मध्य प्रदेश में अफीम बेल्ट पर अब सख्ती क्यों?

– मध्य प्रदेश में अफीम बेल्ट पर सख्ती मुख्य रूप से अवैध कब्जे, तस्करी और वैद्य उत्पादन का अवैध बाजार में जाने के बढ़ते मामलों को लेकर है. 2025 में, सीबीएन ने 145 एनडीपीएस (नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस) एक्ट के मामले दर्ज किए, जो 2023 के 114 से अधिक हैं. मंदसौर पुलिस ने 2025 के नवंबर तक 163 मामलों में 448 गिरफ्तारियां कीं, जबकि 2024 में यह संख्या 146 मामलों में 377 थी.
मुख्य समस्या ‘डोडा चूरा’ की तस्करी है, जो पॉपी स्ट्रॉ का कुचला हुआ रूप है. इस पर प्रतिबंध है. पहले राज्य एक्साइज डिपार्टमेंट इसे खरीदता था, लेकिन अब यह संघीय नियंत्रण में है, जिससे काला बाजार फल-फूल रहा है.

तस्कर राष्ट्रीय राजमार्गों का इस्तेमाल कर पंजाब और हरियाणा तक माल पहुंचाते हैं, जहां इसे पारंपरिक पेय के रूप में इस्तेमाल किया जाता है. किसान वैध अफीम का कुछ हिस्सा काले बाजार में बेचते हैं, जहां कीमत 1.5-2 लाख रुपये प्रति किलो है, जबकि सरकारी रेट 1,500-2,000 रुपये प्रति किलो है. पुलिस और सीबीएन की ओर से फेक केस और एक्सटॉर्शन की शिकायतें भी हैं, जिससे किसानों में डर है.

सवाल – अफीम बेल्ट को कम करने की बात क्यों की जा रही है?

– बेल्ट को सीमित करने की चर्चा डायवर्शन कम करने, पैदावार सुधारने और मेडिकल जरूरतों को पूरा करने के लिए है. सितंबर 2025 में जारी 2025-26 की वार्षिक लाइसेंसिंग नीति में लाइसेंस संख्या बढ़ाकर 1.21 लाख की गई. लेकिन कम पैदावार वाले किसानों के लाइसेंस सस्पेंड किए गए. कंसेंट्रेट ऑफ पॉपी स्ट्रॉ (सीपीएस) मेथड को बढ़ावा दिया जा रहा है, जहां डंठल और पत्तियां खरीदी जाती हैं.

इसका उद्देश्य डायवर्जन रोकना है, क्योंकि सीपीएस में तस्करी कम होती है. नीति में 1995-96 से डिजिटाइजेशन से छोटे किसानों को शामिल किया गया. कुल मिलाकर, बेल्ट को सीमित कर गुणवत्ता पर फोकस है, ताकि अवैध बाजार कमजोर हो.

सवाल – क्यों ये बेल्ट विवादों में आ गई?

– अफीम बेल्ट विवादों में इसलिए है क्योंकि वैध और अवैध गतिविधियां आपस में जुड़ी हैं। किसान तस्करों के लालच और पुलिस एक्सटॉर्शन के बीच फंसते हैं। 2015 में राजस्थान में डोडा चूरा बैन से समस्या बढ़ी. युवाओं की गिरफ्तारियां बढ़ीं. मालवा किसान संघठन का कहना है कि फेक केस से डर फैल रहा है.

ऐतिहासिक रूप से, ब्रिटिश राज में अफीम राजस्व का 15% था, लेकिन अब कानून की सख्ती से भ्रष्टाचार और तस्करी के आरोप लगते हैं. इस मामले में 441 लोग नीमच जेल में हैं.

सवाल – ये बेल्ट कौन सी है?

– अफीम बेल्ट मुख्य रूप से मध्य प्रदेश के मंदसौर, नीमच, रतलाम; राजस्थान के प्रतापगढ़, चित्तौड़गढ़; और उत्तर प्रदेश के बाराबंकी, बरेली, लखनऊ, फैजाबाद में है. मध्य प्रदेश में 56,349 लाइसेंस हैं, जो देश के कुल 1.15 लाख का बड़ा हिस्सा है. यह क्षेत्र पारंपरिक रूप से अफीम की खेती करता है, जहां लाइसेंस पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होते हैं.

सवाल – इस अफीम का उपयोग कहां?

– अफीम मुख्य रूप से मेडिसिनल उद्देश्यों के लिए है. इससे मॉर्फिन (दर्द निवारक), कोडीन (खांसी की दवा), और थेबाइन निकाले जाते हैं. उत्पाद नीमच और गाजीपुर की सरकारी फैक्ट्री में प्रोसेस होता है. भारत दुनिया का सबसे बड़ा वैध अफीम उत्पादक है, जो फार्मास्यूटिकल्स एक्सपोर्ट करता है. राज्य सरकारें इसे रजिस्टर्ड अफीम एडिक्ट्स के डी-एडिक्शन के लिए इस्तेमाल करती हैं. पॉपी सीड्स खाने में भी इस्तेमाल होते हैं, हालांकि भारत इनका आयात करता है.

सवाल – इसमें सरकार के क्या नियम हैं?

– NDPS एक्ट यानि नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट 1985 के तहत अफीम की खेती प्रतिबंधित है, सिवाय मेडिकल साइंटिफिक उद्देश्यों के लिए की जा रही लाइसेंसी खेती के. सीबीएन लाइसेंस जारी करता है, ये तय करता है कि कितनी खेती की जाएगी. मध्य प्रदेश में इसका पैरामीटर 56 किलो प्रति हेक्टेयर है. किसान सारी फसल सरकार को बेचते हैं; डायवर्शन पर लाइसेंस रद्द तो होता ही है. साथ में सजा भी. इसका 90% पेमेंट ई-पेमेंट से होता है.

सवाल – इसकी खेती और फसल कितने समय की होती है?

– खेती दीपावली के बाद नवंबर से शुरू होती है. मार्च में होली के आसपास तक चलती है. पौधे लगाने से लैंसिंग तक 3-4 महीने लगते हैं. अप्रैल में फसल सरकार को सौंपी जाती है. खेतों की रक्षा के लिए बाड़ लगाए जाते हैं.

सवाल – अफीम बेल्ट की खेती किनके हाथों में है, बड़े किसान या छोटे किसान?

– ज्यादातर छोटे किसानों के हाथ में है. लाइसेंस व्यक्तिगत होते हैं. वैसे इसकी खेती पारिवारिक परंपरा है, जहां लाइसेंस बेटे से बड़ा माना जाता है. 2008-09 में 44,821 लाइसेंस थे.

सवाल – इसमें कितना पैसा है?

– आर्थिक रूप से आकर्षक लेकिन जोखिम भरा. सरकारी रेट 1,800 रुपये/किलो, लेकिन काला बाजार में 60,000-1,20,000 रुपये/किलो. प्रति हेक्टेयर 8-12 किलो यील्ड से किसान 12,000-24,000 रुपये कमाते हैं, लेकिन डायवर्शन से लाखों. तस्करी में 2-3 लाख/क्विंटल मिलता है.

सवाल – क्यों भारत में अवैध अफीम के उत्पादन के भी आरोप लगते रहे हैं?

– हां, भारत में अवैध अफीम प्रसंस्करण के आरोप हैं, लेकिन ये बड़े पैमाने पर नहीं बल्कि छिटपुट और छोटे स्तर पर. वैध अफीम बेल्ट (मध्य प्रदेश, राजस्थान) से कुछ अफीम काले बाजार में जाती है, जहां इसे क्रूड रूप में या हेरोइन में प्रोसेस किया जाता है.

मणिपुर, अरुणाचल, बिहार, झारखंड जैसे राज्यों में अवैध पोस्त की खेती होती है. वहां से अफीम को लोकल स्तर पर प्रोसेस कर डोडा चूरा या हेरोइन बनाया जाता है. विकिपीडिया और UNODC के अनुसार, भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा अवैध अफीम उत्पादक माना जाता है. गलत तरीकों से इसे एक जगह से दूसरी जगह ले जाकर अवैध प्रोसेसिंग कराई जाती है. ज्यादातर तस्करी कच्चे अफीम या डोडा चूरा की होती है, जिसे पंजाब या अन्य जगहों पर आगे प्रोसेस किया जाता है.



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