.
ये सवाल पूछते हुए उंटेसरा गांव के किसान रोहित की आवाज में तल्खी आ जाती है। दरअसल, ये केवल रोहित की परेशानी नहीं है बल्कि उज्जैन-गरोठ हाईवे के आसपास बसे दर्जनों गांव के किसान इसी परेशानी से गुजर रहे हैं। तीन साल पहले हाईवे बनना शुरू हुआ और अब इसका 90 फीसदी काम पूरा हो चुका है। नेशनल हाईवे अथॉरिटी ने हाईवे के किनारे न तो सर्विस रोड बनाई न ही अंडरपास बनाया।
इस वजह से किसान अपने खेत तक नहीं जा सकते। वे रास्ते के लिए तहसीलदार, एसडीएम और कलेक्टर को कई बार आवेदन दे चुके हैं। सीएम हेल्पलाइन में भी शिकायत की, जब कोई सुनवाई नहीं हुई तो यहां किसानों ने खेत तक जाने के लिए प्रशासन से हेलिकॉप्टर की मांग की है। किसानों की इस मांग के बाद ये समस्या एक बार फिर सुर्खियों में आ गई है।
क्या वाकई में किसान अपने खेत तक नहीं पहुंच पा रहे? हेलिकॉप्टर की मांग सिर्फ सुर्खियां बटोरने का जरिया है या फिर किसान हकीकत में परेशान है? इन्हीं सवालों का जवाब जानने भास्कर की टीम ने उज्जैन-गरोठ एक्सप्रेस-वे से सटे गांवों का दौरा किया और जो तस्वीरें सामने आईं, वे विकास के दावों पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं। पढ़िए रिपोर्ट…
हेलिकॉप्टर की मांग कर अपनी बेबसी जताई उज्जैन से करीब 14 किलोमीटर दूर, गांव उंटेसरा में मानसिंह राजोरिया का खेत है, लेकिन इसे खेत कहना अब शायद ठीक नहीं होगा। यह जमीन का एक बंजर टुकड़ा है, जो आसपास के लहलहाते गेहूं के खेतों के बीच एक बंजर टापू जैसा दिखता है। पिछले तीन साल से इस खेत में एक भी दाना नहीं बोया गया। वजह? खेत के ठीक सामने से गुजरता आलीशान उज्जैन-गरोठ एक्सप्रेस-वे।
हाल ही में मानसिंह उस वक्त सुर्खियों में आए, जब उन्होंने घटि्टया एसडीएम को एक ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में लिखा था, ‘मेरे खेत से निकलने का कोई रास्ता नहीं है। इसलिए मुझे हेलिकॉप्टर मुहैया कराया जाए, ताकि मैं बाजार से बीज और खाद लाकर खेत में बोवनी कर सकूं और फसल पकने पर उसे मंडी तक ले जा सकूं, जिससे मेरे परिवार का पेट पल सके।’
एक किसान की यह अनोखी मांग प्रशासनिक गलियारों में हलचल मचा गई। अफसर सकते में थे और रटा-रटाया जवाब दे रहे थे कि ‘समस्या का निराकरण किया जाएगा।’

मानसिंह राजोरिया का खेत, जहां इस साल वह बुवाई ही नहीं कर सका।
मानसिंह बोला- अब जहर खाने की नौबत आ गई जब हमारी टीम मानसिंह के खेत पर पहुंची, तो उनके साथ उनके बुजुर्ग पिता रामलाल राजोरिया और मां गीताबाई भी थे। बंजर पड़े खेत को दिखाते हुए मानसिंह की आंखें भर आईं। उसने कहा, ‘यह देखिए, तीन साल से यहां कोई फसल नहीं हुई। जुताई के लिए ट्रैक्टर चाहिए, लेकिन उसे लाने का रास्ता कहां है? खेत के सामने 15 फीट की दीवार (फेंसिंग) खड़ी कर दी है। आप ही बताइए, हम ट्रैक्टर लेकर कैसे जाएं?’
मानसिंह ने आगे कहा, ‘हमने प्रशासन से यही कहा कि अगर रास्ता नहीं दे सकते, तो हेलिकॉप्टर दे दो। हमें भी पता है कि वे ऐसा नहीं कर सकते, लेकिन हम और क्या करें? हम तो बस एक रास्ता चाहते हैं।

वादा था सर्विस रोड का, हकीकत में मिली ‘नो एंट्री’ मानसिंह की अकेली कहानी नहीं है। यह उस हर किसान का दर्द है जिसकी जमीन इस एक्सप्रेस-वे के किनारे है। गांव उंटेसरा के पूर्व सरपंच राजेंद्र सिंह चौहान, जिनका खेत भी एक्सप्रेस-वे से सटा है, हालात की गंभीरता समझाते हैं। उन्होंने बताया, जब यह रोड बन रहा था, तो अधिकारियों ने दोनों तरफ सर्विस रोड बनाने का वादा किया था। इसके लिए जगह भी छोड़ी गई थी।
राजेंद्र सिंह बताते हैं, ‘जो जगह सर्विस रोड के लिए छोड़ी गई थी, उस पर भी नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) ने फेंसिंग कर दी और बीच की जमीन को वन विभाग को पौधे लगाने के लिए सौंप दिया। कोई सर्विस रोड बना ही नहीं। अब अगर हम फेंसिंग हटाने की बात करते हैं, तो अधिकारी हम पर FIR दर्ज करने की धमकी देते हैं।

खेतों तक जाने के लिए किराए पर लिए रास्ते सर्विस रोड न होने का दंश झेल रहे किसान रोहित की कहानी बताती है कि यह समस्या उनकी जेब पर कितनी भारी पड़ रही है। रोहित बताते हैं, “मेरी 9 बीघा जमीन थी। एक्सप्रेस-वे निकलने से जमीन दो हिस्सों में बंट गई। एक तरफ दो बीघा जमीन है, जहां जाने का कोई रास्ता नहीं है। पड़ोस में दो किसानों के खेत हैं, जिनके बाद गांव का रास्ता आता है।”
अभी गेहूं की फसल बोई है, लेकिन खेत तक जाने के लिए मुझे उन दोनों पड़ोसियों से रास्ता मांगना पड़ता है। वे भी अपनी फसल में से रास्ता क्यों दें? मैंने उनसे बात की और अब मैं हर फसल पर दोनों खेत मालिकों को 5-5 हजार रुपए देता हूं, तब जाकर मुझे अपनी ही जमीन तक पहुंचने का रास्ता मिलता है। अगर कल को उन्होंने मना कर दिया, तो मैं क्या करूंगा? इस सड़क ने तो हमारे रास्ते ही खत्म कर दिए।”

उज्जैन गरोठ हाईवे जहां दोनों तरफ खेत हैं लेकिन कुछ खेतों तक जाने का रास्ता ही नहीं है।
बंट गए खेत, बंद हो गए पुराने रास्ते पूर्व सरपंच राजेंद्र सिंह आगे बताते हैं कि एक्सप्रेस-वे ने सिर्फ खेतों तक पहुंच ही नहीं छीनी, बल्कि गांवों के पुराने संपर्क मार्गों को भी खत्म कर दिया है। उन्होंने कहा, “हमारे खेत दो हिस्सों में बंट गए हैं। बीच में से रोड निकल गया। हालत यह है कि खेत के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में जाने के लिए भी रास्ता नहीं है। जो पुराने ग्रामीण रास्ते थे, वे भी सड़क निर्माण में बंद हो गए।”
अधिकारियों ने अंडरपास को सर्विस रोड से जोड़ने का वादा किया था, ताकि किसान सड़क के दूसरी ओर आसानी से जा सकें। लेकिन काम पूरा हो गया, टोल वसूला जाने लगा, पर सर्विस रोड का वादा अधूरा ही रह गया। नतीजा यह है कि कई किसानों ने सड़क के दूसरी ओर की अपनी जमीन पर जाना ही छोड़ दिया है, और कई खेत बंजर पड़े हैं।

विकास के लिए दी जमीन, मुआवजे का इंतजार किसान विक्रम की कहानी इस प्रोजेक्ट के एक और स्याह पहलू को उजागर करती है। वह बताते हैं, “मेरे पास कुल तीन बीघा जमीन थी। डेढ़ बीघा सड़क में चली गई, जिसका मुआवजा तो मिल गया। लेकिन बची हुई डेढ़ बीघा जमीन मुझे मिल ही नहीं रही है। वह जमीन सड़क के दूसरी तरफ होनी चाहिए थी, लेकिन वहां किसी और का कब्जा है।
अधिकारियों से शिकायत की तो बोले, तहसील में आवेदन करो। तीन साल से तहसील के चक्कर काट रहा हूं, लेकिन मेरी बची हुई जमीन मुझे नहीं मिली। इस रोड ने तो मुझे बर्बाद ही कर दिया।”

किसानों को अपने ही खेत पर इस तरह से आना जाना करना पड़ता है।
अधिकारी बोले- समस्या का हल ढूंढ रहे हैं
जब इस मामले पर अधिकारियों से बात की गई, तो उनके जवाब बेहद औपचारिक थे। घट्टिया तहसील के एसडीएम राजाराम करजरे बोले- मानसिंह द्वारा हेलिकॉप्टर की मांग को लेकर आवेदन मिला है। खेत पर रास्ता निर्माण को लेकर उनकी मुख्य मांग है। तहसीलदार के पास किसान ने पहले भी आवेदन किया था।
समस्या का निराकरण कर रहे हैं। वहीं एनएचआई के प्रोजेक्ट डायरेक्ट राहुल जाजोरिया का कहना है कि एसडीएम से प्रकरण मिला है। किसान की समस्या वाजिब है। उसका निराकरण कर रहे हैं।