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Khandwa News: पंडित लव जोशी लोकल 18 को बताते हैं कि हिंदू सनातन संस्कृति में कपाल यानी दोनों आंखों और नाक के बीच के स्थान को आत्मा का निवास माना जाता है. शरीर के इसी हिस्से पर तिलक या बिंदी लगाई जाती है.
खंडवा. मध्य प्रदेश के निमाड़ अंचल में मृत्यु के बाद दाह संस्कार से जुड़ी एक ऐसी अनोखी परंपरा निभाई जाती है, जो आस्था, धर्म और सदियों पुराने विश्वासों का प्रतीक मानी जाती है. यहां किसी व्यक्ति के निधन के बाद केवल शव का दाह संस्कार ही नहीं किया जाता बल्कि श्मशान में कुछ विशेष धार्मिक क्रियाएं भी पूरी की जाती हैं, जिनमें काठी और बांस तोड़ने की परंपरा प्रमुख है. निमाड़ क्षेत्र में जब किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, तो विधि-विधान से शव को श्मशान ले जाकर दाह संस्कार किया जाता है. शव को पंचतत्वों में विलीन करने के बाद श्मशान में ही काठी की लकड़ियों को तोड़कर फेंका जाता है. यह प्रथा कई समाजों में वर्षों से चली आ रही है और आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है. मान्यता है कि काठी तोड़ने से मृत आत्मा को शांति मिलती है और उसकी आत्मा इस संसार में भटकती नहीं है.
इस परंपरा के साथ-साथ बांस तोड़ने की रस्म भी निभाई जाती है. शव को जिस बांस की सीढ़ी पर बांधकर श्मशान लाया जाता है, उसी सीढ़ी के एक बांस को निकालकर धार्मिक प्रक्रिया पूरी की जाती है. यह पूरी क्रिया श्मशान में ही संपन्न होती है.
आंखों और नाक के बीच आत्मा का निवास
लोकल 18 से बातचीत में पंडित लव जोशी बताते हैं कि हिंदू सनातन संस्कृति में कपाल यानी दोनों आंखों और नाक के बीच का स्थान आत्मा का निवास माना जाता है. इसी स्थान पर तिलक या बिंदी लगाई जाती है. दाह संस्कार के बाद कपाल क्रिया की जाती है ताकि आत्मा शरीर से मुक्त होकर ईश्वर के चरणों में स्थान प्राप्त कर सके.
आत्मा का खुलता है मार्ग
पंडित जोशी के अनुसार, जिस बांस की सीढ़ी से शव लाया जाता है, उसमें शुद्ध घी का लोटा बांधकर कपाल के ऊपर अग्नि प्रज्वलित की जाती है. इस प्रक्रिया के दौरान कपाल को भेदा जाता है, जिससे आत्मा का मार्ग खुलता है और उसे शांति प्राप्त होती है. इसी क्रम में दाह संस्कार के समय उपयोग की गई काठी को परिवार के सदस्य के हाथों तुड़वाया जाता है.
सांसारिक बंधनों से मिले मुक्त
उन्होंने कहा कि इस काठी या लकड़ी को तोड़ने के पीछे मान्यता है कि आत्मा को सांसारिक बंधनों से मुक्त किया जाए ताकि वह वापस न लौटे, इधर-उधर न भटके और ईश्वर में लीन हो जाए. इसके बाद आगे की सभी धार्मिक प्रक्रियाएं पूरी की जाती हैं. निमाड़ अंचल की यह अनोखी प्रथा आज भी लोगों की गहरी आस्था और सांस्कृतिक विरासत को दर्शाती है, जहां मृत्यु के बाद भी आत्मा की शांति के लिए विशेष रीति-रिवाज निभाए जाते हैं.
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राहुल सिंह पिछले 10 साल से खबरों की दुनिया में सक्रिय हैं. टीवी से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई संस्थानों के साथ काम किया है. पिछले चार साल से नेटवर्क 18 समूह में जुड़े हुए हैं.
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