‘भार्गव, साहू-दांगी जैसे गोत्र वाले आदिवासी कैसे हो गए’?: मानस भवन के पीछे झुग्गियों का मामला; अध्यक्ष बोले- 27 परिवार में आधे भी आदिवासी नहीं – Bhopal News

‘भार्गव, साहू-दांगी जैसे गोत्र वाले आदिवासी कैसे हो गए’?:  मानस भवन के पीछे झुग्गियों का मामला; अध्यक्ष बोले- 27 परिवार में आधे भी आदिवासी नहीं – Bhopal News


भोपाल के पॉलिटेक्निक चौराहा स्थित मानस भवन के पीछे बसे 27 झुग्गी परिवारों हटाए जाने को लेकर सियासत भी गरमा गई है। बस्ती वालों के समर्थन में कांग्रेस खुलकर मैदान में उतरी और भोपाल से लेकर जबलपुर लड़ाई लड़ी। हाईकोर्ट ने स्टे भी दे दिया। इससे बस्ती में जश

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इस मुद्दे पर दैनिक भास्कर ने मानस भवन प्रबंधन से भी चर्चा की। कार्याध्यक्ष रघुनंदन शर्मा ने कहा कि 27 परिवार में से आधे भी आदिवासी नहीं है। भार्गव, साहू, दांगी जैसे गोत्र वाले आदिवासी कैसे हो गए? हमने तो बस्ती वालों की मदद और उन्हें मकान का मालिकाना हक दिलाने के लिए प्रशासन को 54 लाख रुपए जमा करा दिए। हमारी जमीन पर अनाधिकृत कब्जा है। वो हमें दी जाए। झुग्गियां हटे या नहीं, इसे लेकर हमें कोई लेना-देना नहीं है।

जिस बिल्डिंग में मानस भवन, उसका लोकार्पण दिग्विजय ने किया तुलसी मानस प्रतिष्ठान का लोकार्पण 30 मार्च 2003 को हुआ था। महामंडलेश्वर स्वामी सत्यमित्रानंद गिरी, राज्यपाल डॉ. भाई महावीर मुख्य अतिथि थे, जबकि अध्यक्षता पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने की थी। विशिष्ठ अतिथि के रूप में विधानसभा अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद शुक्ल, तत्कालीन संस्कृति मंत्री अजय सिंह थे। अध्यक्ष शर्मा ने कहा कि मानस भवन संस्था गरीबों के हितों में काम करती है।

अध्यक्ष बोले- जिस खसरे पर मानस भवन, उसी पर मुख्यमंत्री निवास भी सोमवार को प्रशासन खसरा नंबर-1413/1 रकबा 31.5130 हेक्टेयर नोईयत वन अंशभाग 5613 वर्ग फीट के अतिक्रमण को हटाने की कार्रवाई करने वाला था, लेकिन कार्रवाई स्थगित हो गई थी और शाम को स्टे आ गया।

मानस भवन के अध्यक्ष शर्मा ने बताया, मानस भवन खसरा नंबर-1413 पर स्थापित है। इसी में मुख्यमंत्री निवास, अशोका होटल, आकाशवाणी, गांधी भवन-हिंदी भवन भी है। पुराने जमाने में यहां झाड़ियां रही होंगी। इसलिए वन लिखा होगा। इसके बाद 1959 में यह राजस्व रिकॉर्ड में आया। फिर पूरी पहाड़ी का विकास हुआ। फिर विभिन्न संस्थाओं को जमीन शासन ने दी।

वर्ष 1989 में मुख्यमंत्री श्यामाचरण शुक्ल जी के समय मानस भवन को डेढ़ एकड़ जमीन अलॉर्ट की गई है। तब 87 झुग्गियां थीं। उस दौरान ही झुग्गियों को यहां से हटाकर मानस भवन को कब्जा मिला था। फिर बिल्डिंग बनी। तब कुछ क्षेत्र रह गया था, जिसमें झुग्गियां थीं।

आदिवासी के नाम पर राजनीति कर रही कांग्रेस अध्यक्ष शर्मा ने बताया कि कब्जाधारियों में 27 परिवार का सूची है, लेकिन सभी आदिवासी नहीं है। आदिवासी के नाम पर गलत और भ्रामक जानकारी दी जा रही है। 10 मुस्लिम परिवार, 7-8 दूसरे सामान्य और पिछड़ा वर्ग परिवार है। भार्गव, साहू, दांगी जैसे गौत्र वाले लोग हैं, जो आदिवासी नहीं है। कुछ परिवार आदिवासी हो सकते हैं। इनकी आड़ में अन्य लोगों को बचाने के लिए राजनीति की जा रही है, जो गलत है। हमारी भूमि 1300 स्क्वायर वर्ग फीट है। यह जमीन हमें दे दें। बाकी को लेकर हमारा कोई लेना-देना नहीं है। झुग्गियां बनी रहे तो हमें कोई लेना-देना नहीं है।

मानस भवन संस्था ने 2-2 लाख रुपए के हिसाब से राशि जमा की अध्यक्ष शर्मा ने कहा कि जिला प्रशासन के पास राशि नहीं थी तो मानवीय आधार पर मानस भवन संस्था ने ही 2 लाख प्रति परिवार के हिसाब से 54 लाख रुपए दिए हैं। बाकायदा, चेक से भुगतान किया गया। जिला प्रशासन से हमें पत्र भी मिला। इसके बदले झुग्गी में रहने वाले 27 परिवारों को मालीखेड़ा में फ्लेट दिए गए हैं। मालीखेड़ा में पहले भी अन्य जगहों के लोगों को विस्थापित किया गया है। शर्मा ने कहा कि यह जमीन उनकी नहीं है। शासन 1 साल से प्रयास कर रहा है। बावजूद कुछ लोग राजनीतिक रोटियां सेंक रहे हैं।

पूर्व मुख्यमंत्री ने जानी वस्तुस्थिति अध्यक्ष शर्मा ने पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की तारीफ भी की। उन्होंने कहा कि जब दिग्विजय सिंह यहां आए तो लोग नारेबाजी कर रहे थे। इस पर दिग्विजय सिंह ने कहा था कि नारेबाजी करने की जरूरत नहीं है। मैं रघुनंदन शर्मा से बात करुंगा कि वस्तुस्थिति क्या है। कम से कम उन्होंने (दिग्विजय सिंह) वस्तुस्थिति जानने का प्रयास तो किया। 70 वर्ष तो मानस भवन को ही नहीं हुए। क्षेत्रीय पार्षद शबिस्ता जकी अपने ही नेताओं को गलत जानकारी दे रही हैं।

कार्रवाई के विरोध में लोगों ने इस तरह से परचे चस्पा रखे थे।

12 घंटे में कार्रवाई स्थगित, विरोध और स्टे इससे पहले सोमवार को मानस भवन के पीछे बसे 27 झुग्गी परिवारों को 12 घंटे तक ड्रामा चला। पहले प्रशासन का सुबह 6 बजे से कार्रवाई करने की बात कहना, फिर पुलिस बल न होने की बात कहते हुए कार्रवाई स्थगित कर देना, इसी बीच बस्ती में जाने वाले रास्ते पर लोहे का गेट लग जाना और फिर शाम को स्टे मिल जाना शामिल रहा।

कार्रवाई को रोकने के लिए जैसे ही स्थगत मिला, बस्ती में जश्न मनाया जाने लगा। पूर्व मंत्री पीसी शर्मा, पार्षद शबिस्ता जकी, गुड्‌डू चौहान समेत कांग्रेसियों के ऊपर रहवासियों ने फूल बरसाए। 25 दिसंबर को ही रहवासियों को बेदखली के आदेश जारी हुए थे।

ऐसे में रहवासियों में डर का माहौल था। इधर, बस्ती के अंदर जाने वाले रास्ते पर रातोंरात एक लोहे का गेट भी लगा दिया गया। गेट किसने लगाया? ये शाम तक साफ नहीं हो सका, लेकिन शाम को जैसे ही जबलपुर हाईकोर्ट से स्टे मिलने की सूचना प्राप्त हुई, गेट खुल गया। इसके बाद कांग्रेसियों पर रहवासियों ने फूल बरसाए।

हाईकोर्ट से स्थगन आने के बाद खुशी से झूमते रहवासी।

हाईकोर्ट से स्थगन आने के बाद खुशी से झूमते रहवासी।

मालीखेड़ी में शिफ्ट करने का प्लान सोमवार को भारी-भरकम पुलिस अमले के साथ जिला प्रशासन परिवारों को मालीखेड़ी में शिफ्ट करने का प्लान था। इसमें 4 एसडीएम, 4 तहसीलदार, 10 नायब तहसीलदार, 11 राजस्व निरीक्षक और 72 पटवारियों की ड्यूटी लगाई गई थी। इनमें एसडीएम रविशंकर राय, दीपक पांडे, लक्ष्मीकांत खरे, अर्चना शर्मा, तहसीलदार हर्षवर्धन सिंह, अनुराग त्रिपाठी, करुणा दंडोतिया, सौरभ वर्मा, नायब तहसीलदार राजेश गौतम, अतुल शर्मा, सुनीता देहलवार, प्रेमप्रकाश गोस्वामी, योगेश श्रीवास्तव, दिनकर चतुर्वेदी, मो. इदरीश खान, प्रतिनेश तिवारी, शुभम जैन और अंकिता यदुवंशी भी शामिल हैं।

80 साल पुरानी बस्ती है ये यह बस्ती लगभग 80 साल पुरानी है। यहां 27 से अधिक आदिवासी और कुछ गैर-आदिवासी परिवार रहते हैं। शासन ने 25 अगस्त को नोटिस जारी किया और कहा गया कि सात दिन में जगह खाली करें। यहां 27 परिवारों के 200 से ज्यादा लोग रहते हैं। दीवाली के दौरान शिफ्टिंग का विरोध भी हुआ था।



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