क्या यही है ‘सबसे साफ शहर’ का सच? इंदौर में 25 दिसंबर से 2 जनवरी तक कैसे बिगड़ते गए हालात, देखें पूरी रिपोर्ट

क्या यही है ‘सबसे साफ शहर’ का सच? इंदौर में 25 दिसंबर से 2 जनवरी तक कैसे बिगड़ते गए हालात, देखें पूरी रिपोर्ट


Indore Water Contamination Crisis: एमपी का इंदौर जिसे अक्सर भारत के सबसे साफ़ शहरों में गिना जाता है, 2026 की शुरुआत में एक गंभीर स्वास्थ्य संकट का सामना कर रहा है. भागीरथपुरा इलाके में पानी की क्वालिटी में अचानक बदलाव देखा गया. पानी में बदबू, कड़वा टेस्ट और रंग बदलना जैसे संकेत सामने आए. इसके बाद स्थानीय लोगों में वोमिट, लूज मोशन, डिहाइड्रेशन और तेज़ बुखार जैसी परेशानियां बढ़ने लगीं, जिससे अस्पतालों में मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ी. इस संकट में अब तक 11 मौतें दर्ज की गई हैं और सैकड़ों लोग इलाज के लिए भर्ती हुए. आपको बता दें, जहरीला पानी पीने से अब तक 15 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 201 मरीज अलग-अलग अस्पतालों में भर्ती हैं, जिनमें 32 को ICU में रखा गया है. 71 मरीजों को इलाज के बाद डिस्चार्ज कर दिया गया है. भागीरथपुरा इलाके में अब भी डर का माहौल है, लोग पानी पीने से भी डर रहे हैं. गलियां सुनसान पड़ी हैं क्योंकि ज्यादातर लोग अस्पतालों में हैं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, असेफ पानी पीने से बैक्टीरियल गैस्ट्रोएंटेराइटिस, हैजा, टाइफाइड और पेचिश जैसी बीमारियां फैल सकती हैं. इंदौर के मामले में शुरुआती जांच से पता चला कि पानी की सप्लाई में इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी और सीवेज का मिलना इस प्रकोप की मुख्य कारण था. यह घटना सुरक्षित पानी सप्लाई सिस्टम और रेगुलर निगरानी के महत्व को उजागर करती है. मीडिया रिपोर्ट के हवाले से गंदे पानी से होने वाली बीमारी के मामले सामने आए हैं.

क्या हुआ और कब हुआ ?
पानी में स्मेल और स्वाद की शिकायतें मिलीं.
पीने के बाद उल्टी और दस्त जैसी समस्याएं शुरू हुईं.
अस्पतालों में मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ी.
जांच में पानी में बैक्टीरिया और सीवेज की पुष्टि हुई.
अधिकारियों ने प्रभावित पाइपलाइन की मरम्मत और सफाई की.
निवासियों को नल का पानी न पीने की सलाह दी गई.

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, गंदे पानी से होने वाली बीमारी के मामले कब से शुरू हुए हैं, आइए जान लेते हैं…

25 दिसंबर, 2025
पानी का बांटने का काम जारी था, लेकिन कई परिवारों ने पानी के कड़वे स्वाद और तेज गंध की शिकायत की. कुछ लोग कोई व्यवस्था न होने की वजह से इस पानी से पीना और खाना बनाने का काम कर रहे थे.

27-28 दिसंबर, 2025
पहली बार बीमार होने वाले लोगों की खबर मिली, जिसमें लोगों को उल्टी, तेज दस्त और कमजोरी जैसी समस्याएं शुरू हुईं. शुरुआती इलाज लोकल क्लीनिकों में किया गया.

29 दिसंबर, 2025
बीमार लोगों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी। महापौर पुष्यमित्र भार्गव ने पुष्टि की कि दूषित पानी के कारण कम से कम 3 लोगों की मौत हुई है. इसके अलावा कई लोग अस्पताल में भर्ती हो रहे थे.

30 दिसंबर, 2025
अस्पताल में भर्ती लोगों की संख्या 100 से ज्यादा हो गई. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 1,100 लोग बीमार पड़ चुके थे. मेडिकल टीम घर-घर जाकर सर्वे कर रही थी.

31 दिसंबर, 2025
मृतकों की संख्या पर आधिकारिक आंकड़ों में 4 से 7 मौतें दर्ज हैं. छह महीने के एक शिशु की भी मौत हुई, जिसे दूषित पानी से बने दूध पीने का कारण बताया जा रहा है. फिलहाल, दूषित पानी की जांच में लापरवाही के लिए एक जोनल अधिकारी और सहायक अभियंता को निलंबित किया गया, जबकि प्रभारी उप-अभियंता को बर्खास्त किया गया.

1-2 जनवरी, 2026
लैब रिपोर्ट से पानी में जीवाणु संक्रमण की पुष्टि हुई, सर्वे में पता चला कि सैकड़ों परिवार प्रभावित थे. कई परिवारों का इलाज कर उन्हें ठीक किया गया. इसके अलावा प्रभावित जल पाइपलाइन की मरम्मत और सफाई कर दी गई. अधिकारियों ने निवासियों को सलाह दी कि जब तक स्थिती ठीक न हो जाए तबतक नल का पानी न पिएं.



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