यहां पूरा संकट 25 दिसंबर को सामने आना शुरू हुआ, जब पेट से जुड़ी समस्याओं के चलते करीब 70 मरीज अस्पताल की ओपीडी में पहुंचे थे. डॉक्टरों को लगा, यह मौसम से जुड़ी सामान्य बीमारी होगी. लेकिन चार दिन बाद तस्वीर बदल चुकी थी. 29 दिसंबर को मरीजों की संख्या 129 हो गई, 30 दिसंबर को 240 और 31 दिसंबर तक यह आंकड़ा 310 तक पहुंच गया. हर दिन बढ़ते ये नंबर सिर्फ आंकड़े नहीं थे, बल्कि उन घरों की कहानी थे, जहां अचानक बीमारी ने दस्तक दी थी.
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, पूर्वी इंदौर जोन की जिम्मेदारी संभाल रहे डॉक्टर नितिन ओझा बताते हैं कि सबसे दर्दनाक पल वह था, जब उन्हें समझ आया कि संक्रमण कई दिनों से फैल रहा था. गंदा पानी चुपचाप पाइपलाइनों से बहता रहा और लोग उसे पीते रहे. जब तक पहली मौत सामने आई, तब तक बहुत देर हो चुकी थी. डर और अफरातफरी का माहौल बन गया. लोग उबला पानी पीने लगे, लेकिन कई घरों तक वह सलाह समय पर नहीं पहुंच पाई.
इतने कैसे बिगड़ गए हालात?
डॉक्टर ओझा कहते हैं कि शुरुआती दिनों में कई मरीज निजी क्लीनिकों और छोटे अस्पतालों में चले गए. वहां कुछ को राहत मिली, लेकिन कई गंभीर मरीजों को संभालना मुश्किल हो गया. बुजुर्गों की हालत तेजी से बिगड़ने लगी. पहले से डायबिटीज, दिल और किडनी की बीमारी से जूझ रहे लोगों के लिए यह संक्रमण जानलेवा साबित हुआ. कई परिवारों ने अपने बुजुर्गों को अपनी आंखों के सामने कमजोर पड़ते देखा.
वहीं पश्चिमी जोन के प्रभारी डॉक्टर ओमेश नंदवार बताते हैं कि अस्पताल में भर्ती मरीजों की तस्वीर और भी चिंताजनक थी. करीब 95 फीसदी मरीज महिलाएं थीं और उनमें से 70 से 80 फीसदी को किडनी फेल होने जैसी गंभीर समस्या हो गई. कुल 310 मरीज अस्पताल में भर्ती हुए, जिनमें कई को आईसीयू में रखना पड़ा. सबसे छोटा मरीज सिर्फ 10 साल का था, जिसने शायद यह भी नहीं समझा होगा कि उसके साथ क्या हो रहा है.
तीन अन्य अस्पतालों की जिम्मेदारी संभाल रहे डॉक्टर अभिषेक निगम बताते हैं कि हालात को देखते हुए डॉक्टरों को बहुत कम समय में इलाज का पूरा सिस्टम खड़ा करना पड़ा. हल्के मामलों में दवाइयों और फ्लूइड से सुधार हुआ, लेकिन गंभीर मरीजों के लिए अलग-अलग विशेषज्ञों की जरूरत पड़ी. गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट, मेडिसिन और एंडोक्रिनोलॉजी विभाग के डॉक्टर दिन-रात एक साथ काम करते रहे. कई मरीजों को डायलिसिस तक की जरूरत पड़ी.
आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं ने कैसे की मदद?
इस पूरी लड़ाई में सिर्फ डॉक्टर ही नहीं, बल्कि जमीनी स्तर के स्वास्थ्यकर्मी भी नायक बनकर उभरे. महू से आने वाले स्वास्थ्यकर्मी विनोद नीम रोज सुबह छह बजे घर से निकलते और इंदौर पहुंचते. आशा और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के साथ वे एक-एक घर जाकर लोगों की जांच करते. हर परिवार में 10 मिनट रुककर डिहाइड्रेशन के लक्षण देखते, बच्चों और बुजुर्गों पर खास नजर रखते. एक हफ्ते में 66 हजार से ज्यादा लोगों की स्क्रीनिंग हुई और हजारों परिवारों को ओआरएस के पैकेट बांटे गए.
बच्चों की हालत डॉक्टरों को सबसे ज्यादा डराने वाली लगी. बाल रोग विशेषज्ञ डॉक्टर सचिन गर्ग बताते हैं कि बच्चों में संक्रमण बहुत तेजी से असर करता है. थोड़ा सा पानी कम हुआ और बच्चा जानलेवा स्थिति में पहुंच सकता है. इलाके में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी ने हालात और मुश्किल बना दिए. छह महीने का एक बच्चा भी इस दूषित पानी का शिकार बना यह सोचकर ही डॉक्टरों की आवाज भर आती है.
इंदौर की यह त्रासदी सिर्फ बीमारी की कहानी नहीं है. यह उस लापरवाही की कहानी है, जहां चेतावनियां समय पर नहीं सुनी गईं, जहां गंदा पानी कई दिनों तक लोगों के गिलास तक पहुंचता रहा. 70 से 310 तक पहुंचते ये आंकड़े उन जिंदगियों की गवाही हैं, जिन्होंने दर्द, डर और असहायता को बहुत करीब से देखा. डॉक्टरों की थकी आंखें, स्वास्थ्यकर्मियों के छाले पड़े पैर और मरीजों की सूनी निगाहें… इंदौर की यह कहानी लंबे समय तक सिस्टम को आईना दिखाती रहेगी.