Suresh Kalmadi 2010 Commonwealth Games: कांग्रेस के सीनियर नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश कलमाड़ी का लंबी बीमारी के बाद मंगलवार (6 जनवरी) को 81 साल की उम्र में निधन हो गया. सुरेश कलमाड़ी का जिक्र किए बिना आधुनिक भारतीय खेल प्रशासन के इतिहास पर बात नहीं की जा सकती. कभी भारतीय एथलेटिक्स में सबसे प्रभावशाली हस्तियों में से एक और एक शक्तिशाली राजनीतिक नेता रहे कलमाड़ी का करियर महत्वाकांक्षा और विवाद दोनों को दिखाता है. खेल जगत में उनका उदय और 2010 के कॉमनवेल्थ गेम्स (CWG) घोटाले के बाद उनका पतन भारत में खेल प्रशासन का सबसे विवादास्पद अध्याय है.
राजनीति से सफर की शुरुआत
सुरेश किसानराव कलमाड़ी का जन्म 1944 में हुआ था और उन्होंने राजनीति के जरिए सार्वजनिक जीवन में प्रवेश किया. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता के तौर पर उन्होंने पुणे से कई बार संसद सदस्य के रूप में काम किया. अपने राजनीतिक करियर के साथ-साथ कलमाड़ी ने धीरे-धीरे खेल प्रशासन, खासकर एथलेटिक्स में अपनी मजबूत पकड़ बनाई. वह देश के सबसे शक्तिशाली खेल प्रशासकों में से एक बनकर उभरे.
एथलेटिक्स में बड़ी भूमिका
भारतीय खेलों में कलमाड़ी की सबसे अहम भूमिका एथलेटिक्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (AFI) के प्रेसिडेंट के तौर पर थी. राष्ट्रीय स्तर के खेल प्रशासन में पहली बड़ी एंट्री उन्होंने 1987 में की, जब वह एथलेटिक्स फेडरेशन ऑफ इंडिया के प्रेसिडेंट बने, इस पद पर वह 19 साल तक रहे. 1996 में इंडियन ओलंपिक एसोसिएशन के चीफ चुने जाने के बाद उन्होंने भारतीय खेल में और भी बड़ी भूमिका निभाई, जो उनके लगातार 15 साल के कार्यकाल की शुरुआत थी.
कलमाड़ी की उपलब्धियां
एथलेटिक्स हेड के तौर पर कई बार लोकसभा और राज्यसभा सांसद रहे कलमाड़ी ने 1989 से 1998 तक नई दिल्ली में आठ टूर्नामेंट के लिए कुछ सबसे बड़े इंटरनेशनल ट्रैक एंड फील्ड स्टार्स को बुलाया, जिसमें 1989 में पहली बार एशियन चैंपियनशिप भी शामिल थी. वह बाद में एशियन एथलेटिक्स एसोसिएशन के प्रेसिडेंट बने. उन्होंने 1990 में एशियन ग्रैंड प्रिक्स मीट भी शुरू की. खेल प्रशासन से जुड़े पुराने लोग कलमाड़ी को नेशनल गेम्स को फिर से शुरू करने का क्रेडिट देते हैं, जो 1987 के बाद छह साल तक नहीं हुए थे. नेशनल गेम्स भारतीय एथलीटों के लिए एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुए और कलमाड़ी ने पुणे, बेंगलुरु, चंडीगढ़, हैदराबाद और मणिपुर में लगातार इसे आयोजित कर बड़ा नाम बनाया.
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2010 कॉमनवेल्थ गेम्स का आयोजन
कलमाड़ी के कार्यकाल में आजाद भारत ने 2008 में अपना पहला व्यक्तिगत ओलंपिक गोल्ड मेडल जीता था. उन्होंने भारत को बड़े मल्टी-स्पोर्ट्स इवेंट्स का अड्डा बनाया, जिसमें पुणे में 2008 के कॉमनवेल्थ यूथ गेम्स और नई दिल्ली में 2010 के कॉमनवेल्थ गेम्स शामिल हैं. इसी प्रभाव के कारण कलमाड़ी को नई दिल्ली में आयोजित 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स की आयोजन समिति का चेयरमैन नियुक्त किया गया.
खिलाड़ी छाए, कलमाड़ी गए जेल
मैदान पर भारत ने 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स में अपना अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन किया, जिसमें 38 गोल्ड सहित कुल 101 मेडल जीते. यह एक खेल की सफलता थी, लेकिन इसी कॉमनवेल्थ गेम्स से आखिरकार उनका पतन हुआ. कलमाड़ी के नेतृत्व वाली आयोजन समिति पर संगठनात्मक विफलताओं का आरोप लगा और वह भ्रष्टाचार घोटालों में फंस गई. उन्हें अप्रैल 2011 में गिरफ्तार किया गया और नौ महीने जेल में रहने के बाद रिहा कर दिया गया. हालांकि, 2025 अप्रैल में प्रवर्तन निदेशालय ने इस मामले में क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर उन्हें क्लीन चिट दे दी.
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सफर का अंत
अब कलमाड़ी का निधन हो चुका है, लेकिन भारतीय खेलों में उनकी विरासत को लेकर लोगों की राय अभी भी बंटी हुई है. कुछ लोगों के लिए वह एक ऐसे प्रशासक थे जिन्होंने भारत में ग्लोबल इवेंट्स लाने में मदद की और इंटरनेशनल एथलेटिक्स में देश की मौजूदगी बढ़ाई. कई अन्य लोगों के लिए वह सत्ता के दुरुपयोग और खेल संस्थानों पर राजनीतिक नियंत्रण के खतरों का प्रतीक हैं. उनकी कहानी एक चेतावनी है कि जब गवर्नेंस स्ट्रक्चर में निगरानी और नैतिक जवाबदेही की कमी होती है तो क्या गलत हो सकता है.