Chhatarpur Ranu Emotional Story: एक समय था जब रानू की भी हंसी गूंजती थी, छतरपुर की रहने वाली रानू… नाम छोटा है, लेकिन इसकी कहानी बहुत लंबी और दर्द से भरी है. आज जब लोग उसे सड़कों पर भीख मांगते देखते हैं, तो शायद ही किसी को पता हो कि कभी उसका भी एक पूरा परिवार था. मां-बाप थे, भाई थे और सिर पर एक सुरक्षित छत भी. जिंदगी ठीक-ठाक चल रही थी, किसी बात की खास कमी नहीं थी.
शादी हुई, लेकिन यहीं से टूटने लगी जिंदगी
माता-पिता ने रानू की शादी एक पढ़े-लिखे युवक से कर दी, जो पेशे से शिक्षक था. शुरुआत में सब कुछ सामान्य रहा, लेकिन धीरे-धीरे रानू की मानसिक हालत बिगड़ने लगी. परिवार ने इलाज भी कराया, पति ने भी कोशिश की, लेकिन हालात संभल नहीं पाए. आखिरकार पति ने रानू को छोड़ दिया और दूसरी शादी कर ली. यहीं से रानू की जिंदगी अंधेरे में डूबने लगी.
माता-पिता भी छोड़ गए साथ
पति के जाने का सदमा रानू झेल ही रही थी कि किस्मत ने एक-एक कर उसके मां-बाप को भी उससे छीन लिया. मां बहुत धार्मिक थीं, भक्ति-पूजा में रहती थीं, लेकिन वह भी इस दुनिया से चली गईं. कुछ समय बाद पिता का भी सड़क पर चलते-चलते देहांत हो गया. अब रानू इस दुनिया में बिल्कुल अकेली रह गई.
भाइयों ने भी बना ली दूरी
अब रानू के सिर्फ भाई बचे थे, लेकिन मानसिक हालत ठीक न होने की वजह से उन्होंने भी उससे किनारा कर लिया. गांव-समाज में बदनामी के डर से कोई उसे अपने साथ रखने को तैयार नहीं हुआ. नतीजा ये हुआ कि रानू घर-घर भटकने और भीख मांगने को मजबूर हो गई.
20 साल से यूं ही भटक रही है रानू
स्थानीय निवासी सीताराम शुक्ला बताते हैं कि वे पिछले करीब 20 सालों से रानू को इसी हालत में देख रहे हैं. कभी गौरिहार, कभी सरबई तो कभी गहबरा गांव… रानू यूं ही एक जगह से दूसरी जगह भटकती रहती है. देखने में वह भिखारिन लगती है, लेकिन हकीकत ये है कि उसका भी एक परिवार है, जिसने उसे अपनाने से इनकार कर दिया.
जानवरों से भी बदतर जिंदगी
रानू की हालत इतनी खराब है कि प्यास लगने पर उसे नालियों का पानी पीना पड़ता है. एक हाथ की हथेली कट चुकी है, जिसका कभी इलाज नहीं हुआ. तन पर पूरे कपड़े नहीं होते, जो कोई दे देता है वही पहन लेती है. जो खाने को मिल जाए, वही खा लेती है. इंसानी गरिमा क्या होती है, शायद ये उसे अब याद भी नहीं.
देखकर भर आती हैं आंखें
गांव के लोग बताते हैं कि रानू को इस हालत में देखकर आंखें भर आती हैं, लेकिन कोई भी उसकी मदद नहीं कर पा रहा. इलाज नहीं, रहने की जगह नहीं और न ही कोई सहारा. बस सड़कें हैं और सालों से चलता आ रहा उसका दर्द.
क्या कोई आगे आएगा?
छतरपुर जिले में कई समाजसेवी संगठन हैं, लेकिन सवाल यही है कि क्या कोई रानू के लिए आगे आएगा? क्या उसे एक सुरक्षित जगह, कपड़े और दो वक्त का खाना मिल पाएगा? अगर समाज थोड़ा सा भी संवेदनशील हो जाए, तो शायद रानू की जिंदगी बदल सकती है.