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Agriculture tips: वैज्ञानिक डॉ. जीएस कुलमी बताते हैं कि चने की फसल में मुख्य रूप से दो प्रकार के कीड़े नुकसान पहुंचाते हैं. पहला चने की इल्ली, जिसे वैज्ञानिक भाषा में हैलोथिस कहा जाता है. दूसरा चने की तितली, जिसे पोर्टफ्लाई के नाम से भी जाना जाता है. ये दोनों कीट फूल, फल और दानों को नुकसान पहुंचाकर पैदावार में भारी गिरावट ला सकते हैं.
खरगोन. मध्य प्रदेश का खरगोन एक कृषि प्रधान जिला है, जहां रबी सीजन में गेहूं के साथ-साथ चने की बड़े पैमाने पर खेती की जाती है. चना जिले की प्रमुख रबी फसल है और करीब 1 लाख 55 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में किसान देसी और डालर चना उगाते हैं. लेकिन फसलों में कीट और बीमारियों का प्रकोप उत्पादन को प्रभावित कर देता है, जिससे किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है. इन दिनों चने की फसल में दो प्रकार के कीड़े तेजी से देखे जा रहे हैं. यदि समय रहते इन पर नियंत्रण नहीं किया गया तो पूरी फसल बर्बाद हो सकती है.
खरगोन के कृषि वैज्ञानिक डॉ. जीएस कुलमी बताते हैं कि चने की फसल में फूल आने की अवस्था के दौरान कीटों का प्रकोप सबसे ज्यादा बढ़ता है. इस समय मुख्य रूप से दो प्रकार के कीड़े नुकसान पहुंचाते हैं. पहला चने की इल्ली, जिसे वैज्ञानिक भाषा में हैलोथिस कहा जाता है. दूसरा चने की तितली, जिसे पोर्टफ्लाई के नाम से भी जाना जाता है. ये दोनों कीट फूल, फल और दानों को नुकसान पहुंचाकर पैदावार में भारी गिरावट ला सकते हैं.
खेतों में लगाए लाइट ट्रैप
विशेषज्ञों का कहना है कि किसानों को कीट नियंत्रण के लिए शुरुआत से ही सतर्क रहना चाहिए. फसल की उम्र करीब 25 दिन होते ही खेतों में लाइट ट्रैप लगा देना चाहिए. लाइट ट्रैप की रोशनी से वयस्क कीड़े आकर्षित होते हैं और पास आने पर नीचे लगे बॉक्स में फंस जाते हैं. इससे कीड़े आपस में मेटिंग नहीं कर पाते और अंडे देने की प्रक्रिया रुक जाती है. नतीजतन कीटों की संख्या पर काफी हद तक नियंत्रण हो जाता है. प्रति एकड़ एक लाइट ट्रैप लगाना पर्याप्त माना जाता है.
फेरोमेन ट्रैप भी इल्लियों के लिए कारगर
इसके साथ-साथ किसान फेरोमेन ट्रैप का भी उपयोग कर सकते हैं. बाजार में चने की फसल के लिए विशेष फेरोमेन ट्रैप उपलब्ध हैं. इनमें से निकलने वाली खास गंध बड़े आकार के कीड़ों को अपनी ओर आकर्षित करती है. गंध की ओर खिंचकर कीड़े ट्रैप में फंस जाते हैं, जिससे उनकी संख्या धीरे-धीरे कम होने लगती है. फेरोमेन ट्रैप से भी नर और मादा कीड़ों की मेटिंग रुकती है और अंडों का उत्पादन नहीं हो पाता, जिससे फसल सुरक्षित रहती है.
जैविक दवाओं का करें उपयोग
रासायनिक दवाओं के बजाय जैविक उपाय अपनाने पर लागत भी कम आती है और पर्यावरण को भी नुकसान नहीं होता. कृषि वैज्ञानिक बताते हैं कि किसान ब्यूवेरिया बेसियाना और मेटाराइज़ियम एनिसोप्ली जैसी जैविक दवाओं का छिड़काव कर सकते हैं. इन दवाओं का उपयोग 1 किलो प्रति हेक्टेयर या करीब 400 एमएल प्रति एकड़ के हिसाब से करना चाहिए. छिड़काव फूल आने की अवस्था में और घेटे बनते समय करना चाहिए. इसके अलावा एनपीवी वायरस नामक जैविक दवा का भी प्रयोग किया जा सकता है. यह वायरस खेत में डालने पर इल्ली पर असर करता है और उन्हें नष्ट कर देता है. ध्यान रखना जरूरी है कि एनपीवी का उपयोग निर्धारित मात्रा में ही किया जाए. इसकी 300 एलई डोज प्रति हेक्टेयर पर्याप्त होती है.
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7 वर्षों से पत्रकारिता में अग्रसर. इलाहबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स इन जर्नालिस्म की पढ़ाई. अमर उजाला, दैनिक जागरण और सहारा समय संस्थान में बतौर रिपोर्टर, उपसंपादक औऱ ब्यूरो चीफ दायित्व का अनुभव. खेल, कला-साह…और पढ़ें