इंदौर-दाहोद नई रेल लाइन परियोजना की सबसे अहम और चुनौतीपूर्ण कड़ी टीही-पीथमपुर टनल अब अपने निर्माण के अंतिम चरण में है। ये प्रोजेक्ट 8 साल से चल रहा है। टनल के भीतर कंक्रीट का काम पूरा हो चुका है। पटरियों की पहली खेप पहुंचना शुरू हो गई है। कुछ हिस्सों
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पांच साल पहले कोरोना की वजह से कई दिनों तक यहां काम रुका रहा तो कभी पहाड़ से लगातार रिसते पानी और जहरीले सांपों के डर ने इस काम में मुश्किलें खड़ी कीं, लेकिन अब इन तमाम चुनौतियों को पार करते हुए रेलवे और प्रोजेक्ट से जुड़े अधिकारी अगले चार महीने में टनल का काम पूरा कर धार तक ट्रेन पहुंचाने का दावा कर रहे हैं।
यह सिर्फ एक सुरंग नहीं, बल्कि मालवा क्षेत्र के औद्योगिक विकास और यात्री सुविधा के लिए एक मील का पत्थर है। भास्कर टीम टनल के भीतर पहुंची और यहां काम कर रहे इंजीनियर और मजदूरों के संग आठ घंटे बिताए। ये जाना कि किन परिस्थितियों में ये सपना साकार हुआ है। पढ़िए रिपोर्ट
टनल में कीचड़ और अंधेरा, जीप के पहिए थम गए रेलवे और प्रोजेक्ट कंपनी के चार अधिकारियों के साथ हम टनल के पोर्टल-1 (प्रवेश द्वार) पर पहुंचे। अंदर जाने से पहले हमें सेफ्टी शूज, कैप और रिफ्लेक्टिव जैकेट पहनाए गए। अधिकारियों ने साफ किया कि अंदर काम चल रहा है। बिना सुरक्षा उपकरणों के प्रवेश वर्जित है। आपकी कार अंदर नहीं जा सकती। कीचड़ में फंस जाएगी।
हम कंपनी की दो जीप में सवार होकर टनल के भीतर दाखिल हुए। वाहनों की हेडलाइट जलते ही ट्यूबलाइट की हलकी रोशनी में काम करते मजदूर नजर आए। हमारी जीप मुश्किल से 200 मीटर ही आगे बढ़ी होगी कि ड्राइवर ने ब्रेक लगाते हुए कहा- सर! आगे कीचड़ बहुत ज्यादा है। जीप नहीं जा पाएगी। यहां आधुनिक मशीनों और भारी वाहनों के पहिए भी थम गए थे।
हमने पैदल ही आगे बढ़ने का फैसला किया। जैसे ही वाहन से नीचे उतरे। सेफ्टी शूज का महत्व समझ आया। हमारा पैर सीधे घुटने से कुछ नीचे तक मलबे और कीचड़ में धंस गया। घुप अंधेरा। पैरों में लिपटा कीचड़ और हर कदम पर फिसलने का डर। इसी माहौल में हम आगे बढ़ते रहे।

टनल के भीतर फिलहाल कीचड़ और पानी है। पटरी बिछाने का काम भी शुरू हो चुका है।
इंजीनियरिंग का कमाल: प्रदेश की पहली ‘ड्राई टनल’ इस मुश्किल भरे रास्ते पर चलते हुए प्रोजेक्ट मैनेजर ब्रजेश ने हमें टनल की सबसे बड़ी खासियत के बारे में बताया। उन्होंने कहा, ‘यह प्रदेश की पहली ड्राई टनल रहने वाली है।’ उन्होंने समझाया कि पहाड़ से रिसने वाले पानी से निपटने के लिए एक हाईटेक वॉटर ड्रेनेज सिस्टम तैयार किया गया है। कंक्रीट की मोटी दीवारों और पहाड़ के बीच एक विशेष ‘मेंब्रेन’ (झिल्ली) लगाई गई है।
पहाड़ से रिसने वाला पानी इस मेंब्रेन में इकट्ठा होकर हर 50 मीटर पर बने चेंबर में पहुंचता है, जहां से इसे बड़े पाइपों के जरिए टनल से बाहर निकाल दिया जाता है।

काम में तेजी लाने वाला ‘एडिट पॉइंट’ और भविष्य की सुरक्षा अधिकारी हमें अपनी गाड़ी में टनल के ऊपर बने एक सेंट्रल पॉइंट पर लेकर गए, जिसे तकनीकी भाषा में ‘एडिट पॉइंट’ कहा जाता है। प्रोजेक्ट मैनेजर ने बताया कि टनल के निर्माण में तेजी लाने के लिए बीच में लगभग 30 मीटर गहरा और 60 मीटर लंबा एक विशाल गड्ढा खोदा गया। इसका उद्देश्य था कि टनल के दोनों छोरों के साथ-साथ केंद्र से भी खुदाई और निर्माण का काम एक साथ चलाया जा सके।
ऊपर से बड़े-बड़े पाइपों के जरिए कंक्रीट मिक्सर अंदर पहुंचाया जाता था, जिससे समय की भारी बचत हुई। ब्रजेश ने बताया, “टनल बनने के बाद यह एडिट पॉइंट एक महत्वपूर्ण सुरक्षा केंद्र बनेगा। यहां तीन मंजिला इमरजेंसी लिफ्ट और सीढ़ियां बनाई जाएंगी। वेंटिलेशन के लिए बड़े-बड़े जेट फैन लगेंगे।
किसी भी आपात स्थिति में यात्रियों और कर्मचारियों को यहां से सुरक्षित बाहर निकाला जा सकेगा।” इसी के पास रेलवे लाइन को बिजली सप्लाई देने के लिए ग्रिड भी बनकर तैयार हो गया है।

टनल का एंट्री पॉइंट। यहां अब ट्रेन की पटरियां बिछ रही हैं।
बैलेस्टलैस ट्रैक और अंतिम चरण का काम लगभग एक किलोमीटर तक कीचड़ में चलने के बाद हम एक सूखे हिस्से में पहुंचे। यहां कीचड़ साफ कर ट्रैक बिछाने के लिए बेस तैयार कर लिया गया था। सबसे उत्साहजनक दृश्य था यहां पड़ी रेलवे की पटरियां। अधिकारियों ने बताया कि ट्रेन का सपना यहीं से पूरा होगा। इस टनल में बैलेस्टलैस ट्रैक (गिट्टी रहित ट्रैक) बिछाया जा रहा है, जो इस क्षेत्र में पहली बार इस्तेमाल हो रहा है।
इस आधुनिक तकनीक से ट्रैक का रखरखाव न्यूनतम हो जाता है और ट्रेनें अधिक गति और स्थिरता से चल सकती हैं। टनल के दोनों सिरों, जिन्हें पोर्टल-1 और पोर्टल-2 नाम दिया गया है, पर ‘ओपन कट एंड कवर’ का काम तेजी से चल रहा है। यह एक मजबूत कंक्रीट का स्ट्रक्चर है जो टनल को बाहर से सुरक्षित रखता है।
पोर्टल-2 के पास ही पीथमपुर रेलवे स्टेशन का निर्माण भी आकार ले रहा है। यहां दो प्लेटफॉर्म और तीन रेलवे लाइनें होंगी।

चुनौतियों का पहाड़: ब्लास्टिंग, पानी और जहरीले सांप इस 3 किलोमीटर लंबी सुरंग का निर्माण कर रही एबीसीआई कंपनी के लिए यह सफर आसान नहीं था। प्रोजेक्ट मैनेजर ब्रजेश ने बताया कि सबसे बड़ी चुनौती नियंत्रित ब्लास्टिंग (कंट्रोल ब्लास्टिंग) थी। टनल के ठीक ऊपर पीथमपुर शहर बसा हुआ है। हमें यह सुनिश्चित करना था कि ब्लास्टिंग से किसी भी घर को कोई नुकसान न पहुंचे। इसके लिए हमने आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया।”
इसके बाद पानी ने सबसे ज्यादा परेशान किया। बारिश के दौरान टनल में इतना पानी भर गया कि दो से तीन महीने तक काम पूरी तरह रोकना पड़ा। बड़े-बड़े पंप लगाकर पानी बाहर निकाला गया, लेकिन तब तक पानी भरने से पहले किया गया कंक्रीट का कुछ हिस्सा खराब हो गया, जिसे तोड़कर हटाना एक और बड़ी चुनौती बन गया।
इन सबके बीच मजदूरों को काम के दौरान कई बार जहरीले रसेल वाइपर सांपों का भी सामना करना पड़ा, जिन्हें पकड़कर सुरक्षित जंगल में छोड़ा गया। 2020 में कोविड महामारी ने भी प्रोजेक्ट की रफ्तार पर ब्रेक लगा दिया था।