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दिग्विजय सिंह, पूर्व मुख्यमंत्री
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इंदौर में दूषित पेयजल के कारण 20 से अधिक नागरिकों की मृत्यु एक गहरी मानवीय त्रासदी है। जिन जिंदगियों को दूषित पानी ने निगल लिया, उन्हें न तो लौटाया जा सकता है और न ही किसी मुआवजे से परिजनों का दुःख कम किया जा सकता है। हाँ, एक काम अवश्य किया जा सकता है- पता लगाया जाए कि लापरवाही और भ्रष्टाचार का कौन है जिम्मेदार, नीलकंठ और उत्तरदायित्व की स्वच्छ जल व्यवस्था में कब और कैसे मिल गया।
अपनी सार्वजनिक जीवन में मैं सदैव उत्तरदायित्व स्वीकार करने का पक्षधर रहा हूँ। व्यवस्था के केंद्र में कोई भी दल या व्यक्ति हो, उसका प्रथम दायित्व नागरिकों के लिए सुरक्षित, स्वस्थ और भयमुक्त जीवन का बुनियादी ढाँचा उपलब्ध कराना होता है।
1985 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने प्रसिद्ध वास्तुकार चार्ल्स कोरिया की अध्यक्षता में राष्ट्रीय शहरीकरण आयोग का गठन कर शहरी विकास के प्रति दूरदृष्टि दिखाई थी। आयोग ने समग्र शहरी नियोजन, जन-भागीदारी और स्थानीय निकायों की सशक्त भूमिका पर बल दिया।
दुर्भाग्यवश, उनकी असमय हत्या के कारण आयोग की सिफारिशें पूरी तरह लागू नहीं हो सकीं। यद्यपि, इन्हीं सिफारिशों के आधार पर 74वाँ संविधान संशोधन हुआ, जिसने शहरी सुधारों की नींव रखी। प्रश्न यह है कि क्या आज भी शहरी नियोजन में वैसी दूरदृष्टि शेष है, या हम केवल स्मार्ट सिटी के चमकते पोस्टरों में उलझकर अव्यवस्थित शहरीकरण की कठोर सच्चाई से आंखें मूंदे हुए हैं?
इंटरनेशनल सेंटर फॉर सस्टेनेबिलिटी की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत का लगभग 70% पानी दूषित हो चुका है। भोपाल, ग्वालियर, इंदौर और जबलपुर जैसे शहरों के बुनियादी ढाँचे को सुधारने और नागरिकों को बेहतर पेयजल सुविधा उपलब्ध कराने के लिए 2003 में 200 मिलियन अमेरिकी डॉलर का ऋण प्राप्त हुआ था, जो आज के मूल्य पर 18 हजार करोड़ रुपए से अधिक बैठता है। यह प्रश्न स्वाभाविक है कि इस धनराशि का कितना और कैसे उपयोग हुआ, और उसका लाभ आम नागरिक तक क्यों नहीं पहुंचा?
प्रधानमंत्री द्वारा प्रारंभ किया गया राष्ट्रीय जल जीवन मिशन एक सराहनीय पहल थी, किंतु इसके क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। मप्र में विपक्ष के साथ-साथ सत्तारूढ़ दल के विधायकों ने भी इस योजना में लापरवाही और भ्रष्टाचार के आरोप लगाए। ग्रामीण-शहरी क्षेत्रों में पाइपलाइन बिछाने वाली एजेंसियों, सामग्री आपूर्तिकर्ताओं और स्वीकृति देने वाले अधिकारियों की मिलीभगत एक स्कैंडल खड़ा करती रही और स्मार्ट सिटी योजनाओं का महिमामंडन होता रहा।
राज्य की अनेक ग्राम पंचायतों में गुजरात की कंपनियों को कैसे ठेके दिए गए, यह भी सवालों के घेरे में है। कई कंपनियों ने कार्य पूर्ण किए बिना ही भुगतान ले लिया, बाद में उन्हें ब्लैकलिस्ट किया गया। फिर वही लोग अन्य नामों से ठेके लेते रहे।
के.एल. गांधी कंस्ट्रक्शन (सूरत), इन्फ्रास्ट्रक्चर कंस्ट्रक्शन (सूरत), अमृत इन्फ्राप्रोजेक्ट (सूरत), नीलकंठ कॉर्पोरेशन (अहमदाबाद), वेस्टकॉन इन्फ्रा (सूरत), जयखंडेश्वर इंटरप्राइजेज और ग्रीन कंकीट कंस्ट्रक्शन (अहमदाबाद) जैसी कंपनियों को किन शर्तों पर ठेके मिले- यह जानने का अधिकार नागरिकों को है। क्या इंदौर के भागीरथपुरा में भ्रष्टाचार का यही सीवेज पेयजल की पाइपलाइनों में नहीं मिला होगा?
पहाड़ी और वनांचल क्षेत्रों में जल भंडारण के लिए ओवरहेड टैंक नहीं बनाए गए। अनेक गांवों में केवल स्टैंड लगा दिए गए, जिनमें न पाइप है, न पानी। आदिवासी क्षेत्रों में कई पंचायत प्रतिनिधियों तक यह जानकारी नहीं है कि उनकी पंचायतों में नल-जल योजना कागजों में पूरी घोषित कर दी गई है। जब राजधानी भोपाल में ही जल परीक्षण के लिए पर्याप्त सुविधाएं और अमला उपलब्ध नहीं है, तो ग्रामीण क्षेत्रों में बेहतर स्थिति की अपेक्षा कैसी की जा सकती है?
यदि भारत के सबसे स्वच्छ शहर इंदौर में दूषित पानी से लोगों की जान जा सकती है, तो यह मानना कठिन नहीं कि दूरस्थ और वंचित अंचलों में कैसी नीतियां अनदेखी रह जाती होंगी।
आजादी के समय देश की मात्र 17% आबादी शहरों में रहती थी, जो आज लगभग 31% हो चुकी है। 2030 तक यह 40% के आसपास होगी। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराना बड़ी चुनौती बन गया है। समस्या सिर्फ पाइपलाइन बिछाने से हल नहीं होगी। इसके लिए अवैध बस्तियों पर नियंत्रण, सीवेज और पेयजल लाइनों का पृथक्करण तथा हर 10 वर्ष में नया मास्टर प्लान अनिवार्य है।
भोपाल में मेरे मुख्यमंत्री कार्यकाल में 1994 में मास्टर प्लान लागू किया गया था, जिसे 2004-05 में अपडेट किया जाना चाहिए था। दुर्भाग्यवश, पिछले 20 वर्षों में इस पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया। हम विकास के चमकते पोस्टर लगा सकते हैं, मेट्रो की पटरियों पर खाली घड़ियां चला सकते हैं, किंतु आम नागरिक के घर के नल से स्वच्छ जल नहीं निकलता, तो यह विकास अधूरा है।