खरगोनः इन दिनों मां नर्मदा के उत्तर और दक्षिण तटों पर पैदल परिक्रमा करने वाले श्रद्धालुओं की लंबी कतारें दिखाई दे रही हैं. कोई आत्मिक शांति और मोक्ष की तलाश में है तो कोई समाज, धर्म और राष्ट्र हित की कामना लेकर परिक्रमा कर रहा है. इन्हीं में शामिल है श्री पंचायती अखाड़ा निरंजनी की 1008 महामंडलेश्वर सत्यप्रिया गिरी जो काशी में भगवान शिव के नंदी को उनका मूल स्थान दिलाने की कामना लेकर मां नर्मदा की करीब 3500 किलोमीटर लंबी पैदल परिक्रमा पर निकली है.
बता दें कि, महामंडलेश्वर की उपाधि मिलने से पहले वे साध्वी सत्यप्रिया किशोरी के नाम से जानी जाती थी. वे प्रख्यात साध्वी ऋतुम्भरा की शिष्या हैं और अखंड निराहार नर्मदा परिक्रमा करने वाले दादा गुरु की मानस पुत्री हैं. 21 वर्षीय साध्वी सत्यप्रिया गिरी ने 12 नवंबर को ओंकारेश्वर से मां नर्मदा की परिक्रमा प्रारंभ की थी. इस समय वें खरगोन जिले में उत्तर तट से गुजर रही है. उनकी इस यात्रा के करीब 50 दिन पूरे हो चुके है.
इस यात्रा के दौरान मार्ग में उन्हें 5 वर्षों से अखंड निराहार नर्मदा परिक्रमा करने वाले दादा गुरु का सानिध्य मिला ओर अब वे दादा गुरु के साथ ही चल रही है. चुंकि, दादा गुरु ने 5 नवंबर को लगभग 1500 परिक्रमा वासियों के साथ अपनी 7वीं नर्मदा परिक्रमा प्रारंभ की थी. दादा गुरु ने सार्वजनिक रूप से साध्वी सत्यप्रिया गिरी को अपनी मानस पुत्री स्वीकार किया है.
महामंडलेश्वर सत्यप्रिया गिरी ने लोकल 18 से बातचीत में बताया कि उनकी यह परिक्रमा आत्मिक तप या व्यक्तिगत मोक्ष के लिए नहीं, बल्कि काशी में भगवान शिव के साथ नंदी की पुनः मूल स्थान पर प्रतिष्ठा की मनोकामना को लेकर है. उनका मानना है कि काशी शिव की नगरी है. ओर शंकर की नगरी में ही नंदी को महादेव की प्राप्ति के लिए प्रतिक्षा करनी पड़ रही है. क्योंकि, नंदी केवल वाहन नहीं, बल्कि शिव तत्व और धर्म व्यवस्था के प्रतीक है. उनकी सही और मूल स्थिति में प्रतिष्ठा सनातन परंपरा के संरक्षण के लिए आवश्यक है.
नर्मदा परिक्रमा का अनुभव साझा करते हुए कहा कि जिस नर्मदा के तट पर चल रहे है वह भगवती है जो सिद्धि नहीं देती बल्कि स्वयं को सिद्ध कर देती है. इस पथ पर वही चल सकता है जिसपर मां भगवती की कृपा हो, हम खुद को भाग्यशाली मानते है कि हमें यह सौभाग्य प्राप्त हुआ. साथ ही अवधूत दादा गुरु का सानिध्य मिला. यह पदयात्रा दक्षिण तट ओंकारेश्वर से प्रारंभ हुई थी. लगभग एक हजार किलोमीटर का सफर तय हो चुका है. परिक्रमा का 50वां दिन है. श्रद्धालुओं का स्नेह और संत समाज का आशीर्वाद मिल रहा है.
बता दें कि, महामंडलेश्वर सत्यप्रिया गिरी मूल रूप से मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल की रहने वाली है. उनका जन्म वर्ष 2004 में बसंत पंचमी के दिन हुआ. धार्मिक वातावरण में पली-बढ़ी सत्यप्रिया के पिता आचार्य मुकेशानंद महाराज स्वयं कथावाचक रहे है. बताया जाता है कि जिस समय सत्यप्रिया का जन्म हुआ, उस समय उनके पिता गंगा तट पर श्रीमद्भागवत कथा का प्रवचन कर रहे थे. परिवार और अनुयायी इसे मां सरस्वती की विशेष कृपा मानते है.
बाल्यकाल से ही सत्यप्रिया का झुकाव धर्म और अध्यात्म की ओर रहा. मात्र तीन वर्ष की उम्र से वे अपने पिता की कथाओं को ध्यानपूर्वक सुनने लगी थी. पांच वर्ष की आयु में उन्होंने स्वयं को ईश्वर को समर्पित करने की इच्छा जताई और आठ वर्ष की उम्र में पहली बार व्यास गद्दी पर विराजमान होकर श्रीमद्भागवत कथा का विधिवत वाचन किया. उनकी सौम्य वाणी, सरल श्लोक और सहज प्रस्तुति ने कम उम्र में ही उन्हें अलग पहचान दिला दी.
उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, छत्तीसढ़, दिल्ली और हरियाणा सहित कई राज्यों में 100 से ज्यादा श्रीमद्भागवत कथा, श्रीराम कथा, सुंदरकांड पाठ और यज्ञ-अनुष्ठान करा चुकी है. प्रयागराज महाकुंभ के दौरान श्री पंचायती अखाड़ा निरंजनी ने उन्हें महामंडलेश्वर की उपाधि प्रदान की. अपने प्रवचनों और नर्मदा परिक्रमा के माध्यम से महामंडलेश्वर सत्यप्रिया गिरी समाज सेवा, धर्म रक्षा और सनातन मूल्यों के संरक्षण का संदेश दे रही है.