विंध्य क्षेत्र की शादियों में आज भी निभाई जाती है परछन रस्म, इसके बिना अधूरी है वधू का गृहप्रवेश; जानें अनोखी परंपरा

विंध्य क्षेत्र की शादियों में आज भी निभाई जाती है परछन रस्म, इसके बिना अधूरी है वधू का गृहप्रवेश; जानें अनोखी परंपरा


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Rewa News: विंध्य क्षेत्र के शादियों में कई प्रथा परंपरा आज भी प्रचलित है. जैसे कि हमारे बघेलखंड के विवाह कार्य में परछन तीन प्रकार का होता है. एक परछन तो वह होता है कि जब लड़के की बारात निकल रही होती है तो मंगल कलश. जिसमें ज्योत जल रहा होता है. उसको लेकर के एक सुहागन खड़ी होती है और दूल्हे की मां, बड़ी मां, मामी, चाची समेत जितनी बड़ी उम्र की घर की माताएं बहनें वह सभी ज्योत से हाथ दिखा करके वर के सिर में तिलक लगाकर आशीर्वाद देते हैं.

विंध्य क्षेत्र अपनी कला संस्कृति और प्रथा परंपरा के नाम से भी जाना जाता है. यहां जन्म से लेकर मृत्यु तक अलग अलग रस्म और संस्कार पूरे किए जाते है. बघेलखंड में खासकर शादियों में भिन्न भिन्न प्रकार की रस्में होती है. इन्हीं रस्मों में से एक रस्म परछन रस्म की है. इस रस्म की खास बात यह है की इसके बिना वधू का गृहप्रवेश नहीं होता है.

विंध्य क्षेत्र के शादियों में कई प्रथा परंपरा आज भी प्रचलित है. जैसे कि हमारे बघेलखंड के विवाह कार्य में परछन तीन प्रकार का होता है. एक परछन तो वह होता है कि जब लड़के की बारात निकल रही होती है तो मंगल कलश. जिसमें ज्योत जल रहा होता है. उसको लेकर के एक सुहागन खड़ी होती है और दूल्हे की मां, बड़ी मां, मामी, चाची समेत जितनी बड़ी उम्र की घर की माताएं बहनें वह सभी ज्योत से हाथ दिखा करके वर के सिर में तिलक लगाकर आशीर्वाद देते हैं.

रीवा की लोक गायिका रीति सरगम ने बताया कि विंध्य क्षेत्र के शादियों में कई प्रथा परंपरा आज भी प्रचलित है. पानी ऊतार कर बारात प्रस्थान करती है आशीर्वाद लेकर. इसे ही परछन यानी मौर सौपना कहते है. विवाह के बाद जब लड़का दुल्हन लेकर अपने घर आता है तब दरवाजे पर ही परछन किया जाता है. उसे डोला परछन कहते है. डोला अर्थात हमारा बेटा डोली में बहु को लेकर आया हुआ है. यही सोचकर माता बहनें यह रस्म पूरी करती है और वर वधु को आशीर्वाद देती है. परछन में घर में महिलाएं मूसल, मथानी, बांस के बर्तन लेकर मंगलगीत गाते हुए किया जाता है. एक परछन की रस्म बेटी की बिदाई के समय किया जाता है. जिसमें बेटी को मीठा दही खिलकर कलश दिखाकर बिदा किया जाता है.

समय ने सभी के जीने का तरीका बदल दिया है. वैवाहिक कार्यक्रम का स्वरुप भी बदल गया है. धन ने वैवाहिक के मूल स्वरुप को बदल कर रख दिया है. अब दिखावा अधिक है. पहले घर से बारात निकलती है. बेटी की विदा घर से होती थी अब यह रस्म खत्म सी हो गई है जिस कराण रिश्ते मजबूत नहीं रहते हैं. आधुनिकता के कारण वैवाहिक कार्यक्रम दिखावा बन कर रह गये है. लेकिन छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों में आज भी विवाह की रस्में निभाई जाती है.

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बघेलखंड की अनोखी परंपरा, जहां परछन बिना नहीं होता वधू का गृहप्रवेश



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