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Kohrauri Bari Recipe: कोहड़ौरी बरी विंध्य क्षेत्र का एक पारंपरिक और लोकप्रिय व्यंजन है. यह मूल रूप से उड़द दाल और सफेद कद्दू से बनाई गई सुखाकर रखी जाने वाली बरी है, जिन्हें साल भर इस्तेमाल किया जा सकता है. लेकिन, इसे बनाने का आदिवासी स्टाइल एकदम अलग है, जानें…
मध्य प्रदेश के विंध्य क्षेत्र में जैसे ही ठंड दस्तक देती है, घर-घर में कोहड़ौरी बरी की खुशबू फैलने लगती है. यह बरी सिर्फ एक पारंपरिक व्यंजन नहीं, बल्कि सर्दियों में गांव वालों के जीवन का मजबूत सहारा भी है. आदिवासी लोग इसे बारहमासी खाद्य पदार्थ कहते हैं, क्योंकि यह सब्जी का विकल्प भी है. दाल का काम भी करती है. सेहत के लिहाज से भी फायदेमंद मानी जाती है. सर्दी-खांसी में इसका सूप किसी देसी नुस्खे से कम नहीं होता. विंध्य क्षेत्र के ग्रामीण अंचलों में कोहड़ौरी बरी बनाना एक परंपरा है.
ठंड शुरू होते ही इसकी तैयारी शुरू हो जाती है. इसकी सबसे अहम वजह है सफेद कद्दू, जिसे स्थानीय भाषा में बरिहा कहा जाता है. यही इस बरी का मुख्य घटक होता है. बरिहा चाहे जितने महंगे दाम में मिले, लोग इसे खरीदकर बरी जरूर बनाते हैं. आदिवासी क्षेत्र में आज भी महिलाओं में इसे बनाने को लेकर खास उत्साह देखने को मिलता है. गांवों में महिलाएं एक-दूसरे के घर इकट्ठा होकर सामूहिक रूप से बरी तैयार करती हैं. आदिवासी समाज में इसे बनाना एक बड़ी उपलब्धि माना जाता है.
ओस की बूंद पड़ना जरूरी!
स्थानीय रसोइया प्रियंका सिंह के अनुसार, ठंड शुरू होते ही सबसे पहले सफेद कद्दू की व्यवस्था की जाती है. फिर उड़द दाल जुटाई जाती है. गांव-पड़ोस की महिलाएं एक साथ बैठकर बरी बनाती हैं. उनके मुताबिक, उड़द दाल को अच्छी तरह साफ कर धोने के बाद पीसा जाता है. अगर दाल को सिलबट्टे पर पीसा जाए तो स्वाद और भी बेहतर हो जाता है. इसके बाद बारीक किया हुआ सफेद कद्दू तय मात्रा में मिलाया जाता है और इसमें पारंपरिक मसाले डाले जाते हैं. खास बात ये कि इस बरी में लहसुन का इस्तेमाल नहीं किया जाता. तैयार मिश्रण से बरी बनाकर धूप में सुखाया जाता है. सुखाने के दौरान ओस की बूंदों का पड़ना जरूरी माना जाता है, लेकिन पूरी तरह सूखना बेहद अहम है, नहीं तो इसमें कीड़े लगने का खतरा रहता है.
इसलिए कोहड़ौरी बरी खास
आदिवासी समुदाय के मनोहर गोड ने बताया, कोहड़ौरी बरी का उपयोग औषधीय नुस्खे के रूप में भी होता है. सर्दी होने पर इसकी बरी का सूप पीने से राहत मिलती है. स्वाद के साथ-साथ यह पोषण से भरपूर होती है. गांवों में जब घर में सब्जी या दाल न हो, तब बरी का पानी ही सब्जी और दाल का काम कर देता है. ठंड में चावल के साथ बरी का पानी गरीबों के लिए किसी वरदान से कम नहीं. यही वजह है कि कोहड़ौरी बरी आज भी विंध्य क्षेत्र की रसोई और संस्कृति की पहचान बनी हुई है.
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