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Makar Sankranti: छतरपुर जिले में मकर संक्राति पर्व एक अनूठी परंपरा के साथ मनाया जाता है. यहां मिट्टी के घोड़ों की पूजा करके इस पर्व की शुरुआत होती है. मिट्टी के घोड़ों से बाजार सजे रहते हैं और लोग घोड़ों की खरीदारी भी खूब होती है. साथ ही मकर संक्रांति के मौके पर उनकी पूजा भी करते हैं. जानें ये परंपरा…
मकर संक्रांति पर्व पर जहां ज्यादातर शहरों में पतंग खरीदकर उड़ाने का चलन है. वहीं बुंदेलखंड के छतरपुर में मिट्टी के घोड़े, चकरी और गढ़िया गुल्ला खरीदकर इन्हें पूजने की परंपरा है. ये परंपरा बेहद प्राचीन है. इस परंपरा से कई किस्से भी जुड़े हुए हैं.

दरअसल, छतरपुर जिले में मकर संक्राति के पर्व को एक अनूठी परंपरा से मनाया जाता है. यहां मिट्टी के घोड़ों की पूजा करके इस पर्व की शुरुआत होती है और मिट्टी के घोड़ों से बाजार सजे रहते हैं. लोग घोड़ों की खरीदारी भी करते हैं. साथ ही मकर संक्रांति के मौके पर उनकी पूजा भी करते हैं.

मान्यता है कि मकर संक्रांति के दिन से सूर्य देव के घोड़ों ने विश्राम के बाद दोबारा तेज रफ्तार पकड़ी थी, इसलिए परंपरा है कि घोड़ों की पूजा संकेत देती है कि अब घोड़े फिर से दौड़ने के लिए तैयार हैं.
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साथ ही यह परंपरा छतरपुर समेत पूरे बुंदेलखंड में देखी जाती है. यह परंपरा सूखे जैसी स्थितियों से बचने और अच्छी फसल की कामना से भी जुड़ी है. मान्यता है कि घोड़ों की पूजा से घर-परिवार में सुख-समृद्धि आती है और वे सुरक्षा प्रदान करते हैं.

यहां कुम्हार मिट्टी के घोड़े बनाते हैं, जिन्हें स्थानीय लोग खरीदते हैं. खासकर मकर संक्रांति के दिन घर-आंगन में रखकर इनकी पूजा करते हैं. मकर संक्रांति के एक दिन पहले से ही बाज़ार मिट्टी के घोड़ों से सज जाते हैं. लोग इनकी पूजा करके सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाते हैं.

पंडित रामफल शुक्ला लोकल 18 को बताते हैं कि छतरपुर में मकर संक्रांति पर्व पर घोड़ों को खरीदने और पूजा करने की परंपरा पीढ़ियों से चली आ रही है. आज भी छतरपुर में मकर संक्रांति के दौरान ग्रामीण इलाकों में घोड़ों की पूजा के बाद खपरैल वाले घरों में ये मिट्टी के घोड़े रखने की परंपरा है. परिवार में जितनी संतानें होती हैं, उतने ही घोड़े खरीदने की परंपरा भी है.

पंडित रामफल बताते हैं कि मकर संक्रांति पर्व में सिर्फ मिट्टी के घोड़े ही नहीं, बल्कि मिट्टी की मलिया और चकरी खरीदने की परंपरा है. मलिया में ही घोड़ा पानी और भोजन करता है. साथ ही चीनी से बनी मिठाई गढ़िया गुल्ला लेने की परंपरा भी है.

वहीं, पौराणिक कथाओं के मुताबिक, इस दिन सूर्य देव जब धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में आते हैं, तब उनके रथ में भी एक परिवर्तन होता है. मकर संक्रांति से सूर्य देव के वेग और प्रभाव में भी वृद्धि होती है. मकर संक्रांति से खरमास भी खत्म हो जाता है और शुभ कार्यों के लिए बृहस्पति ग्रह भी मजबूत स्थिति में आ जाते हैं.