मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की लाइव स्ट्रीमिंग के वीडियो को सोशल मीडिया पर मीम्स और शॉर्ट्स के रूप में प्रसारित करने के खिलाफ दायर याचिका पर हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। चीफ जस्टिस की डिवीजन बेंच ने यूट्यूब और इंस्टाग्राम पर अपलोड किए गए 102 विवादित यूआरए
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जबलपुर निवासी अधिवक्ता अरिहंत तिवारी, विदित शाह और डॉ. विजय बजाज की ओर से हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई थी। याचिका में मांग की गई कि हाईकोर्ट की लाइव स्ट्रीमिंग के वीडियो को काट-छांट कर, मीम्स या सनसनीखेज शॉर्ट्स के रूप में सोशल मीडिया पर प्रसारित किए जाने पर तत्काल रोक लगाई जाए।
न्यायिक गरिमा को कमजोर कर रही क्लिपिंग: याचिकाकर्ता
याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट को बताया कि अदालती कार्यवाही की क्लिपिंग कर उसे मसालेदार अंदाज में पेश करना न्यायिक प्रक्रिया और अदालत की गरिमा को कमजोर करता है। उन्होंने कहा कि ओपन कोर्ट में न्यायाधीशों द्वारा कही गई बातों को संदर्भ से हटाकर वायरल किया जा रहा है, जो कि न्यायालय की अवमानना की श्रेणी में आता है।
लाइव स्ट्रीमिंग नियमों का हवाला
याचिका में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट लाइव स्ट्रीमिंग और रिकॉर्डिंग नियम 11(बी) का हवाला देते हुए कहा गया कि किसी भी रूप में अदालत की लाइव-स्ट्रीम सामग्री को संपादित करने, छेड़छाड़ करने या अवैध रूप से उपयोग करने की अनुमति नहीं है। पूर्व में इस नियम के तहत हाईकोर्ट ऐसे कृत्यों पर रोक भी लगा चुका है।
यूट्यूब की जगह वेबेक्स प्लेटफॉर्म की मांग
याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट से यह भी मांग की कि यूट्यूब के बजाय वेबेक्स आधारित सुरक्षित प्लेटफॉर्म के माध्यम से प्रकरणों की लाइव स्ट्रीमिंग की जाए, ताकि सामग्री के दुरुपयोग की संभावना कम हो। साथ ही, रजिस्ट्रार (आईटी) को इस तरह की गतिविधियों पर नियमित मॉनिटरिंग और नियंत्रण के निर्देश देने की मांग भी की गई।
मेटा कंपनी का पक्ष
सुनवाई के दौरान मेटा कंपनी की ओर से कोर्ट को बताया गया कि यदि आपत्तिजनक वीडियो के यूआरएल लिंक उपलब्ध करा दिए जाएं, तो उन्हें हटाया जा सकता है। इस पर हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को विवादित यूआरएल कंपनी को उपलब्ध कराने के निर्देश दिए थे।
102 विवादित लिंक की सूची पेश
याचिकाकर्ता अधिवक्ता अरिहंत तिवारी ने बताया कि उनकी ओर से 102 विवादित यूआरएल लिंक की सूची कोर्ट के समक्ष पेश की गई थी। याचिका की सुनवाई के बाद चीफ जस्टिस की युगलपीठ ने इन सभी लिंक को 48 घंटे के भीतर हटाने के आदेश जारी कर दिए हैं।
पहले भी लग चुकी है रोक
इससे पहले हाईकोर्ट ने क्रिमिनल कोर्ट की लाइव स्ट्रीमिंग पर भी रोक लगा दी थी। कोर्ट का स्पष्ट मत है कि न्यायालय की पारदर्शिता के नाम पर उसकी गरिमा और अनुशासन से कोई समझौता नहीं किया जा सकता।