कत्थे के बिना पान रचता नहीं, गुलकंद के बिना तान सजता नहीं, मेहमानवाजी के लिए ऐसे पेश होता है रीवा का ये पान

कत्थे के बिना पान रचता नहीं, गुलकंद के बिना तान सजता नहीं, मेहमानवाजी के लिए ऐसे पेश होता है रीवा का ये पान


Rewa paan: पान विंध्य की अनूठी सांस्कृतिक पहचानों में से एक है. कुछ क्षेत्रों को छोड़कर, यह पूरे देश में लोकप्रिय है. प्रत्येक क्षेत्र की अपनी अलग विधि है. पान के पत्तों की कई किस्में होती हैं. इसकी खेती के लिए विशेष कौशल की आवश्यकता होती है. खेत से लेकर बाजार तक, इसके स्वाद, ताजगी और कुरकुरापन को बरकरार रखने के लिए इसे पैक करने और लेकर जाने में विशेष कौशल की आवश्यकता होती है. जिस तरह से इन्हें बांधा और गिना जाता है, वह महत्वपूर्ण है और रीवा के किसानों और कारीगरों की रचनात्मकता को दर्शाता है.

रीवा में कई वर्षों से पान की दुकान चलाने वाले संतोष शुक्ला बताते है कि पान खाने का तरीका, इसमें डाली जाने वाली सामग्रियां और इसे लपेटने का तरीका क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग होता है. रीवा के बंगला पान को मेहमान को पान देना गर्मजोशी भरे आतिथ्य सत्कार का प्रतीक है. पान न देना इस बात का संकेत है कि सब कुछ ठीक नहीं है. पान खाने के शौकीन लोगों को देखकर मन तो मचल गया होगा न, पान खाने का शौक रखने वाले लोग अपने साथ पानदान उसी प्रकार से साथ में लेकर चलते थे. जिस प्रकार से आजकल हम लोग अपनी मोबाइल हर वक्त अपने साथ रखते है.

हमारे सनातन धर्म में पूजन के समय भी पान के पत्ते समर्पित किए जाते है. एक समय था जब पान शिष्टाचार में शामिल हुआ करता था. घर आए अतिथि को पान उसी प्रकार से पेश किया जाता था जैसे अब चाय पेश की जाती है. बड़े-बड़े रसूखदार लोगों के नौकर उनका पानदान और पान की पीक थूकने के लिए पीकदान साथ-साथ उठाए चलते थे. पान खाना शान की बात समझा जाता था.

विवाह के बाद वर-वधु भी एक दूसरे को पान खिलाकर नए जीवन की शुरुआत किया करते थे. पानदान का एक और साथी होता था जिसका नाम सरौता था. इससे पान में डालने वालीं सुपारी कतरी जाती थी. रीवा का बंगला पान बहुत प्रसिद्ध हुआ करता था. बंगला पान की धाक भी कम न थी. पूरा मुहं भर देने वाले इस पान की बात ही निराली थी. पहले के समय में घर में कोई भी कार्यक्रम होता था तो पनवाड़ी को कार्यक्रम में दुकान लगाने के लिए आमंत्रित किया जाता था.

पान लगाना और उसकी पुड़िया बनाना भी एक कला है, हर कोई उस तरह से कभी पुड़िया न बना सका जिस तरह पान वाले पुड़िया बना लेते है. जिस तरह से पान खाने वाले लोगों की तादाद अधिक थी उसी प्रकार से पान बेचने वाले लोगों की भी संख्या कम न थी. रीवा में आज भी कई ऐसी दुकान मिल जायेंगी जिनपर सामान्य से नाम लिखे मिल जाएंगे जैसे- बनारसी पान भंडार, चौरसिया पान भंडार नाम से अनेकों दुकानें मिल जाती हैं.

जब तक पान में चूना, कत्था, सुपारी, मुलेठी, सौंफ, इलायची जैसी चीजें डालकर बनता था तब तक ठीक था लेकिन फिर इसमें तंबाकू का आगमन हो गया और फिर पान खाना बुरी आदत माना जाने लगा. संतोष शुक्ला हंसते हुए कहते हैं कि कई लोगों को आज भी पान खाना बहुत पसंद है, बहुत से लोग तो मीठा पान यानी तंबाकू रहित पान ही खाते हैं जो जीभ, होंठ रंग देता है और मुंह को खुशबू से भर देता है लेकिन ये भी यदि ज्यादा खाया जाए तो दांत का रंग बदल देता है जैसे सरकारी दफ्तरों, इमारतों के कोने और दीवारों के रंग बदले रहते हैं.

आजकल तो जलता आग वाला पान चला है लगता है मानो पान नहीं खा रहे हैं बल्कि मुंह में जलता हुआ अंगार रख रहे हैं. इस जलते हुए पान को खाने वालों की भी बहुत संख्या है, परन्तु यदि किसी कार्यक्रम में पान की दुकान सजी है तो लोग साधारण मीठा पान खाना ही पसंद करते है. खैर (अकैसिया कटैचू) बबूल की प्रजाति का एक पेड़ है, जो बबूल कत्था के नाम से भी जाना जाता है. इस वृक्ष की लकड़ी के टुकड़ों को उबालकर इसके रस से कत्था तैयार किया जाता है जिसे पान में चूने के साथ लगाकर खाया जाता है. मसूड़ों से खून आने पर कत्थे का चूरा लगाना चाहिए, काफी फायदेमंद होता है.

पान एक लता होती है, जिसे रीवा के महसांव गांव का बंगला और मीठी पत्ती का पान पूरे भारत में प्रसिद्ध है. जिसे रीवा के बघेल राजपरिवार के दरबार में बड़े शान से महमानों को पेश किया जाता था, इसलिए इसे शाही पान की पहचान भी दी गई है. अनेक हिस्सों में पान की अलग-अलग वैरायटी उगाई जाती है. व्यवसायिक तौर पर उगाया जाता है. इसका वानस्पतिक नाम पाइपर बेटल है. पान के पत्रों का उपयोग पूजा-पाठ, हवन, सांस्कृतिक कार्यों आदि में भी खूब होता है. पान भारतीय संस्कृति का हिस्सा होने के साथ एक महत्वपूर्ण औषधि भी है.

पान के पत्तों में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, खनिज द्रव्य और टैनिन के साथ-साथ कैल्शियम, फॉस्फोरस, लौह, आयोडीन और पोटैशियम जैसे तत्व भी पाए जाते हैं. सर्दी खांसी और जुकाम होने पर सेंकी हुई हल्दी का टुकड़ा पान में डालकर खाने से आराम मिलता है. रीवा में आज भी साधारण पान 30 रुपए में मिलता और मीठा मसालेदार पान 1000 रुपए तक पान प्रेमियों को बड़े आराम से मिल जाता है.



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