शिवपुरीः मध्य प्रदेश का शिवपुरी इलाका महाभारत काल से जुड़ी कई लोककथाओं और ऐतिहासिक मान्यताओं के लिए जाना जाता है. इन्हीं में से एक बेहद रोचक और चर्चित स्थान है बाणगंगा कुंड. कहा जाता है कि यह स्थान पांडवों के अज्ञातवास की यादों को आज भी अपने भीतर समेटे हुए है. यहां मौजूद कुंड न सिर्फ कहानी कहते हैं, बल्कि प्राचीन जल संरक्षण तकनीक का भी उदाहरण पेश करते हैं.
अज्ञातवास के दौरान पांडवों यहां रुके थे
52 कुंडों का अनोखा समूह
कहा जाता है कि पांडवों को यह स्थान इतना पसंद आया कि उन्होंने यहां लंबे समय तक ठहराव किया और जल संरक्षण के लिए 52 कुंडों का निर्माण करवाया. ये कुंड बाणगंगा से लेकर सिद्धेश्वर क्षेत्र तक फैले हुए थे. सभी कुंड पत्थरों से बनाए गए थे और इनकी गहराई करीब 10 से 15 फीट तक बताई जाती है. इन कुंडों की खास बात यह थी कि इन्हें इस तरह से बनाया गया था कि बारिश का पानी लंबे समय तक सहेज कर रखा जा सके. यही वजह है कि सदियों बाद भी इन कुंडों में सालभर पानी रहता है.
पांडवों के नाम पर हैं कुंड
बाणगंगा क्षेत्र के कुंडों के नाम भी लोगों के बीच खासे प्रसिद्ध हैं. यहां भीम कुंड, नकुल कुंड, सहदेव कुंड और सास-बहू कुंड जैसे नामों वाले कुंड मौजूद हैं।
इनमें भीम कुंड सबसे बड़ा माना जाता है, जबकि सास-बहू कुंड अपनी अनोखी बनावट के लिए जाना जाता है। यह कुंड काफी संकरा और बेहद गहरा है, जिसे देखकर लोग आज भी हैरान रह जाते हैं कि उस समय इतनी सटीक संरचना कैसे बनाई गई होगी.
इतिहासकार और लेखक प्रमोद भार्गव के अनुसार, महाभारत काल में जल खोजी तीरों का उल्लेख मिलता है. मान्यता है कि ये तीर इस तरह से बनाए जाते थे कि जहां जमीन के नीचे पानी होता था, वहीं जाकर गिरते थे. तीर लगते ही थोड़ी मात्रा में पानी बाहर आ जाता था. बाद में उसी स्थान पर बड़ा गड्ढा या कुंड बनाकर पानी को इकट्ठा कर लिया जाता था. बाणगंगा के कुंड इसी तकनीक का उदाहरण माने जाते हैं.
शिलालेख भी देते हैं प्राचीनता के संकेत
कुंडों के पास एक बड़ा पत्थर मौजूद है, जिस पर ब्राह्मी लिपि में शिलालेख खुदा हुआ है. इतिहासकार अरुण अपेक्षित बताते हैं कि यह शिलालेख इस स्थान की प्राचीनता की ओर इशारा करता है. हालांकि लिपि पूरी तरह पढ़ी नहीं जा सकी है, लेकिन इससे यह संकेत जरूर मिलता है कि यह स्थल महाभारत काल या उससे भी पहले का हो सकता है.
बाणगंगा इलाके में पाए जाने वाले पत्थरों को स्थानीय लोग पुरतीला पत्थर कहते हैं. इन पत्थरों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि ये बारिश के पानी को अपने अंदर सोख लेते हैं और लंबे समय तक उसे संजोकर रखते हैं. यही कारण है कि इन कुंडों में बारहों महीने पानी बना रहता है, चाहे गर्मी कितनी भी तेज क्यों न हो. इन कुंडों से पानी न तो पंप के जरिए निकाला जाता है और न ही किसी घरेलू उपयोग में लिया जाता है. इसी वजह से इनमें जल स्तर हमेशा बना रहता है और ये आज भी लबालब भरे रहते हैं.