मप्र हाई कोर्ट के बाद अब नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने भी मप्र में पेयजल व्यवस्था पर पूरे सिस्टम के स्तर पर सवाल खड़े किए हैं। एनजीटी की सेंट्रल जोन बेंच ने राज्य सरकार और सभी नगर निगमों को फटकार लगाते हुए कहा कि दूषित पेयजल पर्यावरण, जनस्वास्थ्य और संविधान के अनुच्छेद-21 का सीधा उल्लंघन है। इंदौर समेत पूरे प्रदेश में गंदे पानी से फैली बीमारियों पर स्वतः संज्ञान लेते हुए एनजीटी ने कहा कि यह अकेले इंदौर की समस्या नहीं है। भोपाल, उज्जैन, ग्वालियर और खरगोन जैसे शहरों में भी यही हाल हैं। एनजीटी ने कहा कि अब हर शहर में पानी की गुणवत्ता की जानकारी सार्वजनिक करनी होगी। शिकायत के लिए 24X7 वाटर एप बनाना होगा। पाइपलाइन से लेकर टंकियों तक जिम्मेदारी तय करनी होगी। स्टेट लेवल कमेटी बनाई, मौके की तथ्यात्मक रिपोर्ट देगी
एनजीटी ने माना कि कई शहरों में पानी की लाइनें सीवर के नीचे या बेहद पास बिछी हैं। जगह-जगह लीकेज और जर्जर पाइप हैं। रुक-रुक कर सप्लाई से पाइपलाइन में नेगेटिव प्रेशर बनता है, जिससे गंदा पानी अंदर घुस जाता है। इसके बावजूद न नियमित जांच हो रही है और न समय पर मरम्मत। एनजीटी ने स्टेट लेवल कमेटी बनाई है, जो मौके पर जाकर फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट तैयार करेगी। यह मामला कमल राठी और राशिद नूर खान ने उठाया है, जिनकी ओर से हर्षवर्धन तिवारी और हरप्रीत सिंह गुप्ता ने पैरवी की। जॉइंट कमेटी बनेगी, छह हफ्ते में रिपोर्ट देगी एनजीटी ने मामले की गंभीरता को देखते हुए जॉइंट कमेटी बनाई है, जिसमें पर्यावरण विभाग, नगरीय प्रशासन, जल संसाधन विभाग, आईआईटी इंदौर, सीपीसीबी और एमपीपीसीबी के अधिकारी शामिल होंगे। यह टीम मैदानी जांच कर 6 हफ्ते में रिपोर्ट देगी। एनजीटी ने साफ कर दिया है कि दूषित पानी सिर्फ तकनीकी चूक नहीं, बल्कि अपराध है। अगर अब भी नगर निगम और प्रशासन नहीं चेते, तो भारी जुर्माना और जिम्मेदारी तय होगी। मामले में अगली सुनवाई अब 30 मार्च को होगी। इंदौर में दूषित पानी से मौत पर 15 लाख मुआवजे की मांग एनजीटी से हरदा हादसे की तरह भागीरथपुरा में गंदे पानी से जान गंवाने वालों के परिजनों को 15 लाख, बीमार को 5 लाख रु. मुआवजा देने की मांग की गई है।
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