भोपाल में जनसुनवाई में महिलाएं गुलदस्ते लेकर पहुंची: बस्ती से शराब दुकान हटाने की मांग; किश्त भरने के बाद भी दिव्यांग दंपत्ति बेघर – datia News

भोपाल में जनसुनवाई में महिलाएं गुलदस्ते लेकर पहुंची:  बस्ती से शराब दुकान हटाने की मांग; किश्त भरने के बाद भी दिव्यांग दंपत्ति बेघर – datia News




भोपाल के कलेक्ट्रेट कार्यालय में मंगलवार सुबह 11 बजे जनसुनवाई आयोजित की गई। इस दौरान स्मार्ट सिटी परियोजना के तहत उजड़े परिवारों के पुनर्वास को लेकर किए जा रहे दावों पर सवाल उठे। वहीं दूसरी ओर महिलाओं की शिकायत पर शराब दुकान हटाने की प्रक्रिया शुरू होने की जानकारी सामने आई। शराब दुकान हटाने के लिए महिलाओं ने लगाई गुहार, आदेश जारी जनसुनवाई के दौरान वॉर्ड 37–38 विजय नगर–साईंराम कॉलोनी की महिलाएं फूल और गुलदस्ते लेकर पहुंचीं। महिलाओं ने अपने मोहल्ले से शराब दुकान हटाने की मांग की थी, जिस पर अब प्रशासन ने कार्रवाई शुरू कर दी है। महिलाओं के मुताबिक इलाके में संचालित शराब दुकान से शराबियों का जमावड़ा लगा रहता था, जिससे माहौल खराब हो रहा था। इस मामले में 12 जनवरी 2026 को सहायक आबकारी आयुक्त, भोपाल ने पत्र जारी कर जनशिकायतों के आधार पर शराब दुकानों को वर्तमान स्थान से हटाकर वैकल्पिक स्थान पर स्थानांतरित करने या परिसीमा में बदलाव के प्रस्ताव मांगे हैं। यह प्रक्रिया साल 2026-27 के लिए की जा रही है। दैनिक भास्कर से बातचीत में वॉर्ड 37–38 के लोगों ने बताया कि वे लंबे समय से जनसुनवाई और सीएम हेल्पलाइन के जरिए शिकायत कर रहे थे, जिस पर अब कार्रवाई शुरू हुई है। किश्त भरने के बाद भी दिव्यांग दंपत्ति बेघर सात साल पहले मकान टूटने के बावजूद एक दिव्यांग दंपत्ति को आज तक पक्का घर नहीं मिल सका है। इस बीच परिवार को हर महीने किराया देने के साथ-साथ लोन की किश्त भी चुकानी पड़ रही है। पीड़ित रौशन लाल का मकान स्मार्ट सिटी परियोजना के तहत तोड़ा गया था। उस समय नगर पालिका ने उन्हें बेहतर स्थान पर मकान उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया था। करीब दो साल तक इंतजार और लगातार आवेदन के बाद नगर निगम ने उन्हें कोलार रोड क्षेत्र में मकान अलॉट किया। अलॉटमेंट के बदले नगर निगम ने 2 लाख रुपए जमा कराने को कहा। मजबूरी में दिव्यांग दंपत्ति ने माइक्रो हाउसिंग फाइनेंस कंपनी से 14 प्रतिशत ब्याज दर पर लोन लेकर यह राशि जमा की, ताकि उनके और बच्चों के लिए स्थायी आशियाना मिल सके। 7 साल बाद भी मकान अधूरा अलॉटमेंट के सात साल बाद भी मकान का निर्माण पूरा नहीं हो सका। इस बीच रौशन लाल को हर महीने लोन की किश्त चुकानी पड़ रही है और साथ ही लगभग 7 हजार रुपए किराया भी देना पड़ रहा है। नियमों के अनुसार, यदि छह महीने के भीतर मकान उपलब्ध नहीं कराया जाता है, तो निर्माण एजेंसी या ठेकेदार को किराया और लोन ब्याज की व्यवस्था करनी होती है। लेकिन पीड़ित परिवार का आरोप है कि न तो निर्माण एजेंसी और न ही ठेकेदार इस जिम्मेदारी को निभा रहे हैं। अस्थायी मकान में असुविधा, सुरक्षा को लेकर चिंता फिलहाल परिवार को अस्थायी तौर पर चादर का एक सेट दिया गया है, जिसमें न बिजली की सुविधा है और न ही शौचालय। रौशन लाल की पत्नी मानसिक रूप से बीमार हैं, जिससे परिवार की स्थिति और गंभीर हो गई है। असुरक्षित माहौल में बच्चों की सुरक्षा को लेकर भी चिंता बनी हुई है। यह मामला कलेक्टोरेट कार्यालय में आयोजित जनसुनवाई में उठाया गया। रौशन लाल ने बताया कि यह उनकी चौथी जनसुनवाई है, लेकिन अब तक उन्हें कोई स्थायी समाधान नहीं मिला है। परिवार ने प्रशासन से कम से कम सुरक्षा और सुविधाएं उपलब्ध कराने की मांग की है।



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