शिवपुरी का कुंडलपुर धाम! भगवान श्री कृष्ण और रुक्मणी से जुड़ी रहस्यमय कहानी, 5000 साल पुराना है ये मंदिर

शिवपुरी का कुंडलपुर धाम! भगवान श्री कृष्ण और रुक्मणी से जुड़ी रहस्यमय कहानी, 5000 साल पुराना है ये मंदिर


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Kundalpur Dham in Shivpuri: स्थानीय मान्यताओं के अनुसार वीरा गांव के पास स्थित कुंडलपुर धाम लोगों के बीच काफी चर्चा में रहता है. महंत श्री नारायणदास जी महाराज ने लोकल 18 को बताया कि भगवान श्री कृष्ण ने इसी मंदिर से रुक्मणी जी का हरण किया था. कहा जाता है कि रुक्मणी जी यहां माता पूजन के लिए आई थी और भगवान श्री कृष्ण ने पत्र के माध्यम से सूचना पाकर यहां आकर उनका हरण कर लिया.

मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले में स्थित कुंडलपुर धाम की रहस्यमय कहानी सुनकर आप भी वहां जाने के लिए उत्सुक हो जाएंगे. ऐसा माना जाता है कि इस मंदिर का सीधा कनेक्शन भगवान श्री कृष्ण से है और यह मंदिर करीब 5000 साल से भी अधिक पुराना है. लोक कथाओं के अनुसार इस इलाके के लोग मानते है कि भगवान श्री कृष्ण यहां आए थे. यह मंदिर जिला मुख्यालय से करीब 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है.

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार वीरा गांव के पास स्थित कुंडलपुर धाम लोगों के बीच काफी चर्चा में रहता है. महंत श्री नारायणदास जी महाराज ने लोकल 18 को बताया कि भगवान श्री कृष्ण ने इसी मंदिर से रुक्मणी जी का हरण किया था. कहा जाता है कि रुक्मणी जी यहां माता पूजन के लिए आई थी और भगवान श्री कृष्ण ने पत्र के माध्यम से सूचना पाकर यहां आकर उनका हरण कर लिया.

चंदेरी के राजा शिशुपाल का राज्य भी इस स्थान से लगभग 100 से 150 किलोमीटर की दूरी पर स्थित था. लोककथाओं के अनुसार शिशुपाल और रुक्मणी विवाह से जुड़ी कई घटनाओं का संबंध इसी क्षेत्र से जोड़ा जाता है. लोग मानते है कि यह पूरा क्षेत्र उस कालखंड का साक्षी रहा है. जब श्री कृष्ण और रुक्मणी जी की कथा घटी थी.

वीरा गांव के पास कोटा क्षेत्र में एक किला स्थित है. जिसे लोग रुक्मणी जी के पिता भीष्मक का मानते है. आज भी इस किले के अवशेष लोगों के बीच कौतूहल का विषय बने हुए है. इस स्थान पर आज भी पुराने रथ के पहिए मौजूद है. लोग मानते है कि ये पहिए हजारों साल पुराने है. यहां पर प्राचीन मूर्तियां भी स्थापित है. कहा जाता है कि रुक्मणी जी इस स्थान पर अपनी कुलदेवी की पूजा-अर्चना करने आई थी. इसलिए यह स्थल श्रद्धा और आस्था का बड़ा केंद्र माना जाता है.

श्री कृष्ण और रुक्मणी जी के विवाह की कथा बेहद रोचक है. राजा भीष्मक की पुत्री रुक्मणी बचपन से ही श्री कृष्ण की साहस और वीरता की कायल थी. जब रुक्मणी विवाह योग्य हुईं, तो उनके पिता और भाई रुक्मी को चिंता होने लगी. एक बार राजमहल के पुरोहित जी भ्रमण करते हुए आए और श्री कृष्ण के रूप और गुणों का वर्णन करने लगे. उस वक्त जब रुक्मणी ने उन्हें देखा, तो वह भी मोहित हो गईं और मन ही मन उन्हें अपना स्वामी मान बैठीं.

रुक्मणी के पिता और भाई रुक्मी का संबंध हमेशा श्री कृष्ण का अहित चाहने वाले लोगों से था. जब रुक्मणी का विवाह शिशुपाल से तय हो गया. तब उन्होंने प्रेम पत्र लिखकर ब्राह्मण कन्या सुनन्दा के हाथों श्री कृष्ण तक पहुंचा दिया. पत्र में उन्होंने श्री कृष्ण से निवेदन किया कि वे आएं और उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार करें. अन्यथा वे प्राण त्याग देंगी. भगवान श्री कृष्ण ने योजना बनाई और अपने बड़े भाई बलराम की मदद से रुक्मणी का हरण कर लिया. शिशुपाल अत्यंत क्रोध में आ गया. लेकिन उसे हार का सामना करना पड़ा और श्री कृष्ण देवी रुक्मणी को लेकर चले गए.

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शिवपुरी का कुंडलपुर धाम! भगवान श्री कृष्ण और रुक्मणी से जुड़ी रहस्यमय कहानी



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