मसूर की फसल में 2.5ml इस दवा का करें छिड़काव, माहू और पीलेपन से मिलेगा छुटकारा, डॉ. सुनीत कटियार ने बताए टिप्स

मसूर की फसल में 2.5ml इस दवा का करें छिड़काव, माहू और पीलेपन से मिलेगा छुटकारा, डॉ. सुनीत कटियार ने बताए टिप्स


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Masoor Fasal Kheti Tips: सागर और बुंदेलखंड में मसूर की फसल पर फिर संकट के संकेत मिल रहे हैं. माहू और पीलापन तेजी से फैलने की शिकायतें सामने आई हैं. पिछले साल भारी नुकसान के बाद इस बार किसान रहें सतर्क. कृषि मंत्रालय ने आईपीएम कार्यक्रम के जरिए दी अहम सलाह.

अनुज गौतम, सागर: सागर जिले सहित पूरे बुंदेलखंड में इस समय मसूर की फसल 50 से 60 दिन से अधिक की हो चुकी है. यही वह दौर है जब फसल को सबसे ज्यादा देखभाल की जरूरत होती है. इस बार फिर किसानों से दो बड़ी समस्याओं की शिकायतें सामने आने लगी हैं पहली माहू (एफिड) का प्रकोप और दूसरी फसल में तेजी से फैलता पीलापन. अगर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया, तो उत्पादन पर सीधा असर पड़ सकता है.

पीलापन और माहू से बचाव के लिए क्या करें किसान
विशेषज्ञों के मुताबिक, पीली पड़ रही मसूर की फसल में किसान भाई मैनकोजिन, कार्बेंडाजिम (Carbendazim) या थायोमेथोक्साम (Thiamethoxam) में से किसी एक दवा का उपयोग कर सकते हैं. 2.5 मिली दवा को 3 लीटर पानी में घोलकर प्रति हेक्टेयर लगभग 500 लीटर पानी का छिड़काव करने की सलाह दी गई है. इसके साथ ही नियमित मॉनिटरिंग बेहद जरूरी है.

पिछले साल भारी नुकसान झेल चुके हैं किसान
पिछले साल सागर जिले के रहली, देवरी, गढ़ाकोटा, केसली और गौरझामर क्षेत्र में मसूर की खेती पर फफूंद जनित बीमारियों का भयंकर प्रकोप देखा गया था. कई किसानों को उम्मीद के मुताबिक उत्पादन नहीं मिल पाया था. इसी अनुभव को देखते हुए इस साल पहले से ही किसानों को सतर्क किया जा रहा है.

कृषि मंत्रालय ने चलाया जागरूकता अभियान
इसी कड़ी में भारत सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के तहत आने वाले पेस्ट मैनेजमेंट कार्यालय, मुरैना द्वारा सागर में आईपीएम (Integrated Pest Management) ओरिएंटेशन कार्यक्रम आयोजित किया गया. पेस्ट मैनेजमेंट कार्यालय मुरैना के सहायक निदेशक डॉ. सुनीत कटियार ने बताया कि पिछले साल की गंभीर स्थिति को देखते हुए यह कार्यक्रम तैयार किया गया है, ताकि इस बार किसानों को नुकसान न हो.

वैज्ञानिकों ने बताए कीट प्रबंधन के तरीके
कार्यक्रम में कीटों के मित्र कीटों की पहचान, संरक्षण और संवर्धन पर विशेष जोर दिया गया. अभिषेक सिंह बादल (सहायक वनस्पति संरक्षण अधिकारी) ने किसानों को कृषि पारिस्थितिकी तंत्र विश्लेषण की प्रक्रिया समझाई, ताकि किसान खुद यह तय कर सकें कि दवा की जरूरत है या नहीं और अनावश्यक खर्च से बचा जा सके.

रासायनिक दवाओं के अंधाधुंध इस्तेमाल से बचें
विशेषज्ञों ने साफ कहा कि केवल CIBRC द्वारा अनुशंसित रसायनों का ही उपयोग करें और तय मात्रा से ज्यादा छिड़काव न करें. इससे न केवल फसल सुरक्षित रहेगी, बल्कि लागत भी कम होगी और मिट्टी की सेहत भी बनी रहेगी.

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Shweta Singh, currently working with News18MPCG (Digital), has been crafting impactful stories in digital journalism for more than two years. From hyperlocal issues to politics, crime, astrology, and lifestyle,…और पढ़ें

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