भारत की सड़कों पर हर दिन लगभग 474 लोगों की जान चली जाती है. रोज होने वाली यह दुर्घटनाएं एक ऐसी त्रासदी हैं जो अक्सर सुर्खियाँ नहीं बनती, लेकिन परिवारों और समाज पर कभी न मिटने वाले घाव छोड़ जाती हैं. वर्ष 2023 में देश में 4.80 लाख से अधिक सड़क दुर्घटनाएँ दर्ज की गईं, जिनमें लगभग 1.73 लाख लोगों की मृत्यु हुई. इन आँकड़ों के पीछे उजड़े हुए परिवार, अधूरे सपने और हर दिन शहरों, कस्बों और राजमार्गों पर घटती एक गंभीर मानवीय त्रासदी छिपी है. चूँकि दुर्घटनाओं के शिकार लोगों में बड़ी संख्या 18 से 45 वर्ष आयु वर्ग की है, इसलिए सड़क सुरक्षा केवल एक जन स्वास्थ्य समस्या नहीं, बल्कि देश की उत्पादकता, जीविकोपार्जन और भविष्य से जुड़ी एक गंभीर सामाजिक-आर्थिक चुनौती भी है.
इतने गंभीर संकट, लगातार चेतावनी और व्यापक जागरूकता अभियानों के बाद भी सड़कों पर लोगों का असुरक्षित व्यवहार और आदतें बनी हुई हैं . तेज़ रफ्तार, वाहन चलाते समय ध्यान कहीं और होना, हेलमेट और सीट बेल्ट न पहनना, जल्दबाज़ी और दुर्घटना पीड़ितों की सहायता से बचना—ये सब अब आम बातें बन चुकी हैं. ये केवल व्यक्तिगत चूक नहीं हैं, बल्कि जल्दबाज़ी, अनुशासनहीनता और नागरिक जिम्मेदारी की भावना के कमजोर पड़ने का संकेत हैं. सड़क सुरक्षा का मूल केवल आधारभूत संरचना का विकास, कानून या सजा नहीं है, बल्कि उन छोटे-छोटे निर्णयों में है जो लोग रोज़मर्रा की ज़िंदगी में लेते हैं, खासकर वे जब जल्दबाज़ी में होते हैं या तब जब वे यह सोच लेते हैं कि “कुछ नहीं होगा.”
इस चुनौती की गंभीरता को समझते हुए, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय, माननीय श्री नितिन गडकरी के नेतृत्व में, सड़क सुरक्षा अभियान (SSA) को एक राष्ट्रव्यापी जन-जागरूकता पहल के रूप में लगातार मजबूत कर रहा है. SSA 2026 सड़क सुरक्षा के दृष्टिकोण में एक महत्वपूर्ण बदलाव को दर्शाता है—सिर्फ चिंता करना ही नहीं बल्कि इससे आगे बढ़कर नागरिकों में वास्तविक जिम्मेदारी और सहभागिता की भावना भी विकसित करना.“परवाह से कर्तव्य तक” की थीम पर आधारित सड़क सुरक्षा अभियान 2026 को एक बहु-स्तरीय राष्ट्रीय आंदोलन के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें आत्मचिंतन, संवाद, रचनात्मक अभिव्यक्ति, तकनीक और जन-भागीदारी को जोड़ा गया है. इसका उद्देश्य सड़क सुरक्षा को व्यक्तिगत, सरल और व्यवहारिक बनाना है, विशेष रूप से युवाओं और परिवारों के लिए— ताकि नियमों का पालन केवल मजबूरी न रहे, बल्कि मूल्यों पर आधारित आदत बन सके. संदेश स्पष्ट है: सुरक्षा डर के कारण निभाई जाने वाली बाध्यता नहीं, बल्कि जीवनशैली का हिस्सा होनी चाहिए.
सड़क सुरक्षा अभियान 4.0 के केंद्र में चार परस्पर जुड़े आधार स्तंभ हैं:
कायदा: यातायात नियमों का पालन, संकेतों का सम्मान, हेलमेट और सुरक्षा उपकरणों का उपयोग—यह समझते हुए कि कानून असुविधा के लिए नहीं, बल्कि जीवन की रक्षा के लिए बने हैं.
कर्तव्य: सड़क सुरक्षा केवल नियमों का पालन नहीं, बल्कि स्वयं, अपने परिवार और सड़क पर बाकी चलने वालों के प्रति हमारी व्यक्तिगत जिम्मेदारी और नैतिक दायित्व है.
कवच: कवच के माध्यम से तकनीक और इनोवेशन यानी कि नवाचार की भूमिका को और मजबूत किया जा रहा है जिसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, स्मार्ट प्रवर्तन, पूर्वानुमान पर आधारित विश्लेषण और वाहनों की सुरक्षा से जुड़ी हुई तकनीक जो आने वाले खतरों को पहले ही पहचान कर दुर्घटनाओं को रोकने में मदद कर सकती हैं
क्रांति: क्रांति उस स्थाई परिवर्तन की दिशा की ओर ले जाती है—जहाँ सुरक्षित व्यवहार स्वाभाविक बन जाए, जिम्मेदारी आदत बन जाए और सड़क सुरक्षा रोज़मर्रा के जीवन में रच-बस जाए.
SSA 2026 का एक प्रमुख उद्देश्य सड़क सुरक्षा के व्यवहार को बचपन से ही सही दिशा देना और उसे लगातार मजबूत करना है. माता-पिता, अभिभावक, शिक्षक और समाज के आदर्श व्यक्ति बच्चों के व्यवहार को गहराई से प्रभावित करते हैं—चाहे वे पैदल चलने वाले हों, साइकिल सवार हों या भविष्य के चालक. सड़कें भारत की सबसे बड़ी साझा सार्वजनिक जगहों में से हैं, और उनकी सुरक्षा उतनी ही हमारे दैनिक आचरण पर निर्भर करती है जितनी कानून, इंजीनियरिंग और प्रवर्तन की सुरक्षा हमारे दैनिक आचरण पर निर्भर होती है.
अंततः, सुरक्षित सड़कें केवल सीमेंट और डामर से नहीं बनेंगी. वे तब बनेंगी जब जल्दबाज़ी की जगह अनुशासन लेगा, उदासीनता की जगह संवेदना आएगी और जिम्मेदारी हमारी स्वाभाविक प्रवृत्ति बन जाएगी.
आइए, हर दिन और हर सड़क पर सुरक्षा को अपनी आदत बनाएं—क्योंकि यह हमारा कर्तव्य है.