सेक्स स्कैंडल के आरोपों से घिरे आनंदपुर धाम का सच: 10 हजार बीघा जमीन; खुद की पंचायत, अस्पताल और स्कूल; जमीन पर जबरिया कब्जे के आरोप – Madhya Pradesh News

सेक्स स्कैंडल के आरोपों से घिरे आनंदपुर धाम का सच:  10 हजार बीघा जमीन; खुद की पंचायत, अस्पताल और स्कूल; जमीन पर जबरिया कब्जे के आरोप – Madhya Pradesh News




बाबाओं के सेक्स स्कैंडल के आरोपों देशभर में चर्चा में आए अशोक नगर के आनंदपुर धाम आश्रम को लेकर रहस्य गहराता जा रहा है। आश्रम के भीतर क्या चल रहा है, ये न तो प्रशासन को मालूम है न ही आसपास के लोगों को। आश्रम में किसी की भी एंट्री नहीं है। आश्रम प्रशासन का कहना है कि भीतर एक हजार से ज्यादा महात्मा और भगत हैं। इसमें 60 फीसदी महिला भक्त हैं। दो दिन पहले कांग्रेस ने सेक्स और न्यूड वीडियो जारी करते हुए दावा किया था कि वीडियो में दिखाई दे रहे महात्मा इसी आनंदपुर धाम के हैं। वहीं ट्रस्ट की तरफ से बीजेपी दिल्ली आलाकमान को शिकायत की गई कि अशोक नगर के तत्कालीन कलेक्टर आदित्य सिंह ने तीन करोड़ रुपए मांगे। इस पर सरकार ने 21 जनवरी को अशोक नगर कलेक्टर आदित्य सिंह को हटा दिया। इन दोनों ही मामलों में आनंदपुर धाम ट्रस्ट की तरफ से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी गई। आनंदपुर धाम का सच आखिर क्या है? आखिर आश्रम के भीतर क्या चल रहा है? आसपास के लोग आश्रम के बारे में क्या सोचते हैं? भास्कर की टीम इन सवालों का जवाब जानने आनंदपुर धाम पहुंची तो यहां आश्रम के दो चेहरे नजर आए। एक चेहरा आश्रम में लगे संगमरमर पत्थर की तरह चमकीला है और दूसरा वो आदिवासी हैं जो आश्रम प्रबंधन पर जमीन हड़पने के आरोप लगाते हैं। पढ़िए ये रिपोर्ट… किलेनुमा आश्रम और भीतर की रहस्यमयी दुनिया
अशोक नगर जिला मुख्यालय से लगभग 25 किलोमीटर दूर, ईसागढ़ ब्लॉक की मुख्य सड़क पर चलते हुए अचानक नजारा बदल जाता है। सड़क के दोनों तरफ कई किलोमीटर तक फैली ऊंची-ऊंची दीवारें दिखने लगती हैं, जो किसी पुराने किले की याद दिलाती हैं। ये दीवारें आनंदपुर धाम आश्रम की हैं। ऐसा लगता है मानो आश्रम ने अपने चारों तरफ एक अलग ही दुनिया बसा ली है, जिसमें बाहरी लोगों की एंट्री बैन है। जब हमारी टीम ने आश्रम के विशाल और भव्य मुख्य द्वार से भीतर जाने का प्रयास किया, तो एक सिक्योरिटी गार्ड ने हमें रोक लिया। भीतर से अनुमति मिलने की एक लंबी प्रक्रिया के बाद हमें प्रवेश तो मिला, लेकिन केवल सरकारी पोस्ट ऑफिस और पंचायत दफ्तर तक, जो परिसर के बाहरी हिस्से में स्थित हैं। हमारी गाड़ी के भीतर पहुंचते ही आश्रम के सुरक्षाकर्मी सतर्क हो गए और उनकी निगाहें हम पर टिक गईं। 11 अप्रैल 2025 को पीएम मोदी भी आ चुके
आश्रम के गेस्ट हाउस में प्रबंधन के एक मेंबर ने बताया कि बाहरी लोगों को आश्रम के भीतरी हिस्सों में जाने की इजाजत नहीं है। हमें मंदिर खुलने के निर्धारित समय, दोपहर 3 बजे, एक गाइड के साथ मंदिर तक जाने की अनुमति दी गई। तीन घंटे के इंतजार के बाद, भगत संजीव हमें अपने साथ मंदिर ले गए। मुख्य द्वार से मंदिर तक का रास्ता लगभग 1.5 किलोमीटर लंबा था। यह रास्ता किसी गलियारे जैसा था, जिसके अंत में मंदिर का भव्य शिखर दूर से ही नजर आने लगा था। इसे देखकर यह स्पष्ट हो गया था कि यह कोई साधारण मंदिर नहीं है। भव्य द्वार, सुंदर सरोवर, और फिर संगमरमर से बना एक विशाल प्रांगण, जिसके बाद मंदिर का मुख्य प्रवेश द्वार था। यह वही प्रांगण है जहां 11 अप्रैल, 2025 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी एक कार्यक्रम में शिरकत की थी। 1931 में छोटी सी झोपड़ी से आश्रम की शुरुआत
पूरा परिसर संगमरमर की चमक से दमक रहा था। यहां हजारों लोगों के एक साथ बैठकर सत्संग करने की व्यवस्था है। गुरु-शिष्य परंपरा पर आधारित इस मंदिर में फूलों की मनमोहक सुगंध फैली हुई थी और पांच पूर्व पादशाही गुरुओं के साथ वर्तमान गुरु की तस्वीरें लगी थीं। भगत संजीव ने हमें बताया कि इस आश्रम की शुरुआत 1931 में एक छोटी सी झोपड़ी से हुई थी। 1980 के बाद इसका तेजी से विस्तार हुआ। पहले यहां घना जंगल था और आसपास के गांवों के लोगों को 5 किलोमीटर दूर से पानी लाना पड़ता था। लेकिन आश्रम के विकास के साथ-साथ यहां की स्थिति भी सुधरी। आज यह आश्रम अपनी अधिकांश जरूरतों के लिए आत्मनिर्भर है। अनाज, दूध, और बिजली जैसी आवश्यक वस्तुएं आश्रम के भीतर ही उत्पन्न होती हैं। आश्रम के भीतर और बाहर का सच जुदा
जैसे ही आप आश्रम के गेट से बाहर की दुनिया में कदम रखते हैं, तस्वीर पूरी तरह बदल जाती है। यहां के गांवों में जिससे भी बात करो, वह आश्रम की मनमानी और दबंगई से त्रस्त नजर आता है। ग्रामीणों का आरोप है कि आश्रम प्रबंधन ने बड़े पैमाने पर उनकी निजी और सरकारी जमीनों पर अवैध रूप से कब्जा कर लिया है। गांवों की ओर जाने वाली सड़कों के दोनों ओर आश्रम की किलेनुमा बाउंड्रीवॉल ही नजर आती है, जिसने कई लोगों को उनकी अपनी ही जमीन से बेदखल कर दिया है। ग्रामीणों के अनुसार, आश्रम के पास ऐसे 22 बड़े चक (खेती के बड़े हिस्से) हैं, और हर चक में एक से दो हजार बीघा जमीन है। सरकारी सूत्र भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि आनंदपुर धाम ट्रस्ट के नाम पर राजस्व रिकॉर्ड में 10 हजार बीघा से अधिक जमीन दर्ज है। प्रशासन के पास जबरन कब्जे और बाउंड्रीवॉल बनाने की कई शिकायतें भी दर्ज हैं, लेकिन उन पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। झोपड़ी में आग लगा दी थी,पुलिस ने सुनवाई नहीं की
जमरेड़ा गांव की रहने वाली भमरिया बाई रोते हुए बताती हैं, आश्रम के महात्माओं ने मेरी जमीन हड़प ली। जब हम अपनी जमीन मांगने गए, तो उन्होंने हमें बुरी तरह पीटा। पिछले साल तो उन्होंने हमारी झोपड़ी में आग लगा दी, जिसमें हमारे कपड़े, बर्तन, और अनाज सब जलकर राख हो गया। ये महात्मा नहीं, ये गुंडे हैं। भमरिया बाई का आरोप है कि उन्हें और उनके बेटे को बहुत मारा गया। जब वे शिकायत करने पुलिस के पास गए, तो वहां भी उनकी किसी ने नहीं सुनी। उल्टा पुलिस ने ही उन्हें डरा-धमकाकर भगा दिया।उनके बेटे लालाराम कहते हैं, “यह जमीन मेरे पिताजी के समय से हमारे पास थी। पहले आश्रम वाले हमें फसल का कुछ हिस्सा दे देते थे, लेकिन जब मैंने अपनी जमीन का हिसाब मांगा, तो उन्होंने साफ कह दिया कि तेरी कोई जमीन नहीं है। 18 बीघा जमीन में से केवल 5 बीघा बची
इसी गांव के नारायण आदिवासी की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। वे कहते हैं मेरी 18 बीघा जमीन में से अब सिर्फ 5 बीघा बची है। 13 बीघा जमीन पर आश्रम ने कब्जा कर लिया है। जब मैं उन्हें रोकने गया, तो प्रीतम भगत, सोनू महात्मा, विनय महात्मा, पटवारी महात्मा और सुरेंद्र महात्मा ने मुझे बेरहमी से पीटा और जान से मारने की धमकी दी। मैंने थाने से लेकर तहसील तक हर जगह शिकायत की, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। आज हम मजदूरी करके अपना पेट पाल रहे हैं। प्रेम सिंह आदिवासी और रामचरण जैसे कई अन्य ग्रामीणों ने भी अपनी जमीन पर आश्रम द्वारा अवैध कब्जे की यही कहानी दोहराई। जब डिप्टी कलेक्टर का परिवार भी हुआ असहाय
यह मामला सिर्फ गरीब और अनपढ़ आदिवासियों तक ही सीमित नहीं है। ईसागढ़ में स्कूल चलाने वाले अशोक अहिरवार बताते हैं कि उनके बड़े भाई शिवपुरी में डिप्टी कलेक्टर हैं, लेकिन उनकी जमीन पर भी आश्रम वालों ने जबरन कब्जा कर लिया है। जब उन्होंने अपनी जमीन का सीमांकन कराया, तो पता चला कि उनकी जमीन आश्रम की बाउंड्रीवॉल के भीतर आ चुकी है। अहिरवार कहते हैं, भले ही हमारी जमीन एक बीघा है, लेकिन सड़क से लगी होने के कारण उसकी कीमत 70 लाख रुपए है। जब मेरे भाई जैसे प्रशासनिक अधिकारी और मुझ जैसे पढ़े-लिखे व्यक्ति के साथ यह हो सकता है, तो आप सोच सकते हैं कि यहां के गरीब आदिवासियों के साथ क्या हो रहा होगा? जमीनों के कब्जे पर आश्रम की चुप्पी
आश्रम के पास कुल कितनी जमीन है, इसका कोई सटीक आंकड़ा किसी के पास नहीं है। स्थानीय लोगों का अनुमान है कि आश्रम के पास 14 हजार बीघा से ज्यादा जमीन है, जो 22 अलग-अलग चक में फैली हुई है। इनमें प्रेम नगर, शक्ति नगर, हरि नगर, राम नगर, शांतपुर, विकास नगर, ज्योतिनगर, शिमला पहाड़ी, मोती नगर, और टकमेरी चक जैसे कई नाम शामिल हैं। यह जमीन आसपास की 20 से ज्यादा पंचायतों के गांवों में फैली हुई है। जब हमने इस बारे में आश्रम के भगत संजीव से सवाल किया, तो उन्होंने अनभिज्ञता जाहिर की। उन्होंने कहा, “मुझे इस विषय में कोई जानकारी नहीं है। आश्रम में अलग-अलग विभागों की जिम्मेदारी अलग-अलग लोगों के पास है।” जब हमने कुछ जिम्मेदार महात्माओं से बात करने का अनुरोध किया, तो उन्होंने मौजूदा विवाद पर कुछ भी कहने से साफ इनकार कर दिया। महात्माओं पर लगे यौन शोषण के आरोपों पर सवाल करने पर भगत संजीव ने दार्शनिक सा जवाब दिया।



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