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उज्जैन के सांदीपनि आश्रम में गुरु पूर्णिमा पर सुबह से भक्तों की भीड़ लगी रही है. इस दौरान भक्तों ने आश्रम में भगवान कृष्ण और बलदेव के दर्शन कर उनका आशीर्वाद लिया. यहीं पर भगवान श्रीकृष्ण ने 64 दिन में 64 कलाएं सीखी थीं.
शुभम मरमट /उज्जैन. विद्या और ज्ञान को समर्पित बसंत पंचमी के शुभ अवसर पर उज्जैन स्थित प्रसिद्ध गुरु सांदीपनि आश्रम में विद्यारंभ संस्कार का आयोजन किया गया. इस अवसर पर देश के विभिन्न हिस्सों से माता-पिता अपने नन्हे बच्चों के साथ आश्रम पहुंचे और उन्हें शिक्षा के पथ पर पहला कदम रखवाया. वैदिक मंत्रोच्चार और धार्मिक विधियों के बीच बच्चों ने अक्षर ज्ञान की शुरुआत की. इसी क्रम में विश्व प्रसिद्ध महाकालेश्वर मंदिर में भी बसंत पंचमी का विशेष महत्व देखने को मिला. भस्म आरती के दौरान भगवान महाकाल को पीले वस्त्र अर्पित किए गए और ऋतु के अनुरूप विशेष पूजन संपन्न हुआ.
सांदीपनि आश्रम में हुआ पाटी पूजन और अक्षर लेखन
मंगलनाथ रोड स्थित गुरु सांदीपनि आश्रम है, जहां भगवान श्रीकृष्ण, बलराम और सुदामा ने गुरुकुल शिक्षा प्राप्त की थी, वहां परंपरागत रीति से पाटी पूजन कराया गया. छोटे बच्चों ने स्लेट पर शुभ मंत्र लिखकर विद्या की शुरुआत की. इस दौरान आचार्य व्यास ने बताया कि विद्यारंभ संस्कार हिंदू धर्म के 16 संस्कारों में एक महत्वपूर्ण संस्कार है, जिसके माध्यम से बच्चों को औपचारिक रूप से शिक्षा से जोड़ा जाता है. आयोजन के दौरान भगवान श्रीकृष्ण, बलराम और सुदामा की प्रतिमाओं का विधिवत अभिषेक और पूजा-अर्चना भी की गई.
भगवान श्रीकृष्ण ने सीखी थीं 64 कलाएं
शास्त्रों में वर्णित कथाओं के अनुसार भगवान कृष्ण और बलराम ने इसी आश्रम में अपने गुरु सांदीपनि के सान्निध्य में अल्प समय में समस्त विद्याओं और कलाओं का ज्ञान अर्जित किया था. इसी शिक्षण परंपरा की स्मृति के रूप में आश्रम परिसर में आज भी प्रतीकात्मक रूप से मौली सुरक्षित रखी गई है, जो प्राचीन कालगणना और गुरुकुल प्रणाली का संकेत मानी जाती है. उन्होंने आगे बताया कि सांदीपनि आश्रम में केवल बसंत पंचमी ही नहीं, बल्कि गुरुपूर्णिमा के पावन अवसर पर भी ऐसे ही धार्मिक और शैक्षिक आयोजन किए जाते हैं. इन अवसरों पर नन्हे बच्चों को विधिवत संस्कारों से जोड़ते हुए विद्या और अनुशासन की दीक्षा दी जाती है, ताकि गुरुकुल परंपरा की यह विरासत पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित रह सके.
महाकाल की भस्म आरती में विशेष श्रृंगार
महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती में श्री महाकालेश्वर भगवान को बसंत पंचमी के अवसर पर पीले वस्त्र धारण करवाए गए और पीले बसंत के पुष्प अर्पित किए गए. साथ ही केसरिया भात व मिष्ठानों का भोग लगाया गया.
श्रद्धालुओं ने साझा किए अनुभव
इस अवसर पर विभिन्न राज्यों से आए अभिभावकों ने अपनी भावनाएं और आस्थाएं साझा कीं. ओडिशा से पहुंचीं प्रियंका प्रधान ने बताया कि उनके यहां विद्यारंभ संस्कार को ‘खड़ी छुआ’ के नाम से जाना जाता है. भगवान श्रीकृष्ण की शिक्षाभूमि होने के कारण उन्होंने अपने बच्चे के अक्षर ज्ञान के लिए सांदीपनि आश्रम को चुना.
मनीषा चौहान ने कहा कि उन्होंने अपने बच्चे से ‘जय श्रीकृष्ण’ लिखवाकर उसकी शिक्षा यात्रा की शुरुआत कराई, जिसे वे अत्यंत शुभ मानती हैं. वहीं ममता पाटीदार ने बताया कि उनके परिवार में पीढ़ियों से यह विश्वास चला आ रहा है कि सांदीपनि आश्रम में कराया गया विद्यारंभ बच्चों के उज्ज्वल भविष्य और सफलता का मार्ग प्रशस्त करता है.