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Republic Day 2026: निमाड़ में क्रांति का बिगुल बजाने वाले टंट्या मामा भील देश के उन चुनिंदा क्रांतिकारियों में से एक थे, जिनका नाम सुनते ही अंग्रेजी हुकूमत कांप उठती थी. अंग्रेज उन्हें डाकू कहते थे, लेकिन जनता के लिए वह गरीबों के मसीहा थे. फिरंगियों से लूट हुआ धन वह गरीबों में बांट देते थे. इसलिए लिए खुद अंग्रेजों ने उन्हें भारत के रॉबिन हुड की उपाधि दी. पढ़ें बेहद रोचक कहानी…
टंट्या मामा भील का जन्म 26 जनवरी 1840 को निमाड़ के खंडवा जिले की पंधाना तहसील के बड़दाअहीर गांव में हुआ था. कुछ जगहों पर उनका जन्म वर्ष 1842 भी बताया जाता है. पिता का नाम भाऊसिंह भील था. बचपन से ही टंट्या अलग मिजाज के थे और अन्याय के खिलाफ खड़े रहना उन्होंने जल्दी सीख लिया था.

टंट्या मामा का असली नाम तात्या था, लेकिन लोग उन्हें प्यार से टंट्या मामा कहने लगे. छोटे बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक उन्हें मामा कहकर बुलाते थे. यही नाम आगे चलकर उनकी पहचान बन गया. आज भी भील समाज उन्हें मामा कहकर याद करता है और गर्व महसूस करता है.

टंट्या मामा बचपन से ही साहसी और तेज दिमाग वाले थे. तीरंदाजी में माहिर थे और निशाना कभी नहीं चूकते थे. जंगलों में रहने की वजह से वह गुरिल्ला युद्ध में दक्ष थे. बाद में उन्होंने बंदूक चलाना भी सीख लिया और अंग्रेजों के लिए बड़ी चुनौती बन गए.
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इतिहासकारों की मानें तो 1857 के आसपास मालवा और निमाड़ इलाका अंग्रेजों के जुल्म से परेशान था. आदिवासी समाज पर सबसे ज्यादा अत्याचार हो रहे थे. भील और भिलाला समाज को दबाने की कोशिशें तेज हो गई थीं. ऐसे हालात में टंट्या मामा ने अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया और लोगों को साथ जोड़ना शुरू किया.

टंट्या मामा अंग्रेजों को लूटते थे, लेकिन उस पैसे का एक भी हिस्सा अपने लिए नहीं रखते थे. लूटी गई दौलत गरीबों, जरूरतमंदों और पीड़ित लोगों में बांट दी जाती थी. इसी वजह से लोग उन्हें गरीबों का मसीहा मानने लगे. यही वजह है कि जब उनकी गिरफ्तारी हुई तो खबर न्यूयॉर्क टाइम्स में छपी और खुद अंग्रेजों ने उन्हें ‘भारत के रॉबिन हुड’ के उपाधि दी.

उनका क्षेत्र खरगोन जिले के बड़वाह से लेकर बैतूल तक फैला हुआ था. जंगल, पहाड़ और गांव उनके लिए सुरक्षित ठिकाने थे. अंग्रेजी अफसर उन्हें डाकू कहते थे, लेकिन आम जनता के लिए वह रक्षक थे. उनकी एक आवाज पर लोग जान देने को तैयार रहते थे.

1878 से 1889 के बीच टंट्या मामा ने करीब 15 साल तक अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष की लड़ाई लड़ी. अंग्रेजों के नाक में दम कर दिया. गुरिल्ला युद्ध के जरिए उन्होंने अंग्रेजी फौज को कई बार चकमा दिया. अंग्रेजों की नजर में वह सबसे बड़े बागी बन चुके थे. उनकी मदद करने के शक में हजारों लोगों को जेल में भी डाला गया.

इतिहासकार दुर्गेश राजदीप के अनुसार, टंट्या मामा इतने चालाक थे कि अंग्रेजों को उन्हें पकड़ने में करीब 7 साल लग गए. आखिरकार 1888-89 में उन्हें विश्वासघात के चलते गिरफ्तार किया गया. कहा जाता है कि उन्हीं की मुंहबोली एक बहन के पति गणपत ने ही अंग्रेजों को उनकी जानकारी दी थी.

गिरफ्तारी के बाद टंट्या मामा को पहले इंदौर की सेंट्रल इंडिया एजेंसी जेल में रखा गया. बाद में भारी जंजीरों में जकड़कर जबलपुर जेल ले जाया गया. 19 अक्टूबर 1889 को जबलपुर कोर्ट ने उन्हें फांसी की सजा सुनाई और 4 दिसंबर 1889 को फांसी दे दी गई.

फांसी के बाद विद्रोह के डर से अंग्रेजों ने रात में चुपचाप उनका शव पातालपानी रेलवे स्टेशन के पास फेंक दिया. आज यही जगह टंट्या मामा की समाधि के नाम से जानी जाती है. कहा जाता है कि आज भी यहां से गुजरने वाली प्रत्येक ट्रेन को चालक टंट्या मामा के सम्मान में यहां कुछ पल के लिए रोकते हैं, हॉर्न बजाकर सलामी देते, फिर आगे बढ़ाते हैं.