Balaghat News: मध्य प्रदेश का बालाघाट आदिवासी बहुल जिला है. इसमें भी लांजी-बैहर-बिरसा इलाके में ज्यादातर आबादी आदिवासी समुदाय से ताल्लुक रखती है. इलाका घने जंगलों और पहाड़ों से घिरा है. यहां पर थोड़ी-थोड़ी दूरी पर छोटे-छोटे गांव हैं. इन गावों में बसे ग्रामीण शहर के कोलाहल से दूर अपनी अलग दुनिया बसाएं हैं. हालांकि, शिक्षा, स्वास्थ्य और दूसरी सुविधाओं से ग्रामीण वंचित रह गए, इसलिए ग्रामीणों को कई समस्याएं भी हुईं. सड़क की अच्छी कनेक्टिविटी न होने से इलाका लंबे समय से नक्सल प्रभावित रहा. ऐसे में यहां विकास कार्य करने वाली एजेंसियों के पास एक बहाना था नक्सली काम नहीं करने देते, तो वे काम टालते रहते थे.
लेकिन, बीते कुछ साल में सुरक्षा बलों की कार्रवाई तेज हुई और नक्सली बैकफुट पर चले गए. अब उन इलाकों में पहाड़ों को चीर कर सड़कें बन रही हैं और विकास कार्यों की रफ्तार तेज हो रही है. एक ऐसी ही सड़क लांजी और बिरसा को जोड़ने वाली है, जिसका निर्माण चल रहा है. ये सड़क नक्सल प्रभावित गांव रहे देवरबेली से सतोना से होते हुए मलकुआं तक जाती है. इससे न सिर्फ आदिवासी अंचल के दर्जनों गांव शहर की मुख्यधारा से जुड़ सकेंगे, बल्कि वहां रह रहे ग्रामीणों आर्थिक और सामाजिक विकास भी हो सकेगा. लेकिन, वह सड़क बन कैसी रही है, ये देखने के लिए लोकल 18 की टीम उस जगह तक पहुंची, जिसके विरोध में माओवादी कभी मशीनें जलाते तो कभी मजदूरों को धमकाते थे.
यहां तक बन रही सड़क
बालाघाट के अंतिम छोर पर स्थित गांव देवरबेली से शुरू होकर मलकुआं तक ये सड़क बन रही है, जिसकी लंबाई करीब 16 किलोमीटर है. इस सड़क के बनने से बिरसा और लांजी क्षेत्र के अंदरूनी इलाकों के दर्जनों गांवों को सहुलियत मिलेगी और सफर आसान हो जाएगा. इस सड़क के बनने से बच्चे अच्छे स्कूल और कॉलेज में पढ़ाई कर सकेंगे. इसके अलावा समय पर लोगों को इलाज भी मिलेगा. वहीं, ग्रामीणों को शहर में बाजार करने जाना हो या अपने बनाए हुए उत्पाद बेचना हो, तमाम काम ये ग्रामीण आसानी से कर सकेंगे.
सड़क बनने में 8 साल लग गए
साल 2018 में सड़क बनाने की मंजूरी मिली और 8 करोड़ 33 लाख रुपए से ज्यादा लागत से सड़क बनाने का काम शुरू हुआ. सड़क बनाने का जिम्मा मिला छत्तीसगढ़ के रायपुर से ताल्लुक रखने वाले ठेकेदार मेसर्स संजय अग्रवाल को मिला. वर्क ऑर्डर पास हुआ 28 फरवरी 2018 को और ठेकेदार को काम पूरा करना था 27 अगस्त 2018 को, यानी 6 महीने में बनने वाली सड़क को करीब 8 साल लग गए बनने में. यह सड़क प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना के तहत बन रही है.
नक्सलियों ने नहीं होने दिया काम, कभी ठेकेदार ने छोड़ा
मामले में वरिष्ठ पत्रकार रफी अंसारी ने बताया, ये इलाका नक्सलियों का गढ़ हुआ करता था. ऐसे में नक्सली कनेक्टिवी बढ़ने से परेशान होते थे. उन्होंने कई बार ठेकेदार की मशीनों में आग लगाई तो कभी मजदूरों को धमकाया. इसलिए शुरू में काम प्रभावित हुआ. लेकिन, ठेकेदार भी कम न था. घटिया निर्माण कर मलाई-मिठाई भी खाता था. दो साल बीत गए थे सड़क का काम काफी धीमा था. ऐसे में सरकार ने उनका टेंडर निरस्त कर दिया. इसके बाद काम मिल मेसर्स रायसिंग को मिला, जिसे नक्सलियों ने काफी परेशान किया. नतीजतन ठेकेदार ने सड़क बनाने से इनकार कर दिया और काम छोड़कर चला गया. फिर ठेकेदार संजय अग्रवाल ने प्रशासन के फैसले को कोर्ट में चुनौती दी. नतीजतन फिर से उन्हें सड़क बनाने का जिम्मा मिला. अब सड़क काम भी पूरा होना आया. लेकिन सवाल ये उठने लगा कि ये सड़क गुणवत्ता कैसी है?
खराब क्वालिटी की सड़क कितने दिन टिकेगी?
जिस सड़क बनने में 8 साल का वक्त लगा, वह सड़क हफ्ते भर में ही भ्रष्टाचार का रंग दिखाने लगी है. जिस सड़क को बनाने में सुरक्षाबलों ने नक्सलियों से लोहा लिया, उसे बनाने में ठेकेदार ने क्वालिटी से समझौता किया. गिट्टी का न ढंग से कॉम्पैक्ट हुआ न ही डामर पर उतने क्षमता के साथ रोलर चलाया गया. नतीजतन सड़क हाथ से उखाड़ने से उखड़ रही है. पैर से खुरचने से अलग हो रही है. वहीं, भ्रष्टाचार को छिपाने के लिए दोनों ओर से तेजी से साइडिंग भी भरी जा रही है. लोकल 18 ने मामले को कलेक्टर मृणाल मीना के संज्ञान में लाया. इसके बाद उन्होंने इसमें जांच की बात कही है.