एमपी के शहरों को हरा भरा बनाने के लिए सरकार ने चार दशक पहले कोनोकार्पस और सतपर्णी के पेड़ लगाए थे, अब उन्हीं को हटाने के लिए नगरीय प्रशासन विभाग ने आदेश जारी किया है। दरअसल, स्टडी से साबित हुआ है कि ये पेड़ इंसानी सेहत के लिए एक बड़ा खतरा है। पांच राज्य इसे बैन कर चुके हैं तो सुप्रीम कोर्ट भी चेतावनी दे चुका है। ऐसे में अब नगरीय प्रशासन विभाग ने 9 जनवरी को एक सर्कुलर जारी किया है। विभाग ने आदेश में लिखा है कि अगर कहीं पहले से कोनोकार्पस के पेड़ लगे हैं तो स्थानीय निकाय नियमानुसार इन्हें हटाएं और उनकी जगह स्थानीय प्रजाति के पौधे लगाए जाएं। नगरीय प्रशासन के एसओआर सूची से भी कोनोकार्पस को हटाया जा रहा है, ताकि किसी भी सरकारी पार्क और स्थानों पर इसे लगाने पर रोक लगाई जा सके। अब इस आदेश के बाद पूरे प्रदेश से करीब 50 हजार कोनोकार्पस के पेड़ हटाए जाएंगे। भास्कर ने एक्सपर्ट से बात कर समझा कि आखिर ये इंसानी सेहत के लिए कितना नुकसानदायक है और इतने सालों बाद सरकारें कैसे जागी? सुप्रीम कोर्ट की समिति की रिपोर्ट ने खोली आंखें
सुप्रीम कोर्ट ने कोनोकार्पस से होने वाले नुकसान का आकलन करने के लिए केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (CEC) का गठन किया था। समिति ने 21 अगस्त, 2023 को अपनी रिपोर्ट पेश की थी, जिसमें देश भर में कोनोकार्पस प्रजाति के पेड़ों से उत्पन्न हो रहे गंभीर पर्यावरणीय एवं पारिस्थितिक खतरों पर चिंता जताई गई थी। रिपोर्ट में जिक्र किया कि कोनोकार्पस, जिसे ‘बटनवुड’ के नाम से भी जाना जाता है, को देश के कई शहरों में शहरी हरियाली के लिए बड़े पैमाने पर अपनाया गया है। हालांकि, वैज्ञानिक अध्ययनों और क्षेत्रीय स्तर पर प्राप्त जानकारी से यह सिद्ध हो चुका है कि कोनोकार्पस देश के कई हिस्सों में एक आक्रामक प्रजाति की तरह व्यवहार कर रहा है। सतपर्णी भी आया प्रतिबंध के दायरे में
दिलचस्प बात यह है कि सीईसी की रिपोर्ट में मुख्य रूप से कोनोकार्पस के खतरों का उल्लेख था, लेकिन मध्य प्रदेश के नगरीय प्रशासन विभाग ने अपने आदेश में सतपर्णी को भी शामिल कर लिया। विभाग ने दोनों प्रजातियों को “बेहद खतरनाक” बताते हुए सभी जिला कलेक्टरों को निर्देश दिया है कि इन्हें लगाने से तत्काल रोका जाए और पूर्व में लगाए गए वृक्षों को प्रतिस्थापित करने की कार्ययोजना बनाई जाए। यह निर्णय इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले तीन दशकों में भोपाल, इंदौर, जबलपुर और ग्वालियर जैसे बड़े शहरों में सड़क के किनारे, डिवाइडरों पर और पार्कों में लाखों की संख्या में सतपर्णी के पेड़ लगाए जा चुके हैं। पूर्व अफसर ने बताया, क्यों लोकप्रिय हुए थे पेड़
राजधानी परियोजना वन मंडल (सीपीए) के गठन के समय शहर वृत्त के पहले रेंजर रहे सेवानिवृत्त एपीसीसीएफ, के.सी. मल्ल, उस दौर को याद करते हुए बताते हैं, यह बात 1986 की है, जब राजधानी परियोजना वन मंडल का गठन हुआ था। उस समय शहर में हरियाली को तेजी से बढ़ाने का दबाव था। अधिकारियों ने ऐसे पौधों की तलाश की जो साल के 12 महीने हरे-भरे रहें, अच्छी छाया दें और सुंदर दिखें। वे आगे कहते हैं, इन्हीं मानदंडों के आधार पर सतपर्णी का चयन किया गया। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह थी कि इसकी पत्तियों को मवेशी नहीं खाते थे और इसे बहुत अधिक देखभाल की आवश्यकता नहीं होती थी। मैं उस समय शहर का पहला रेंज अफसर था और हमने शहरी सौंदर्यीकरण योजना के तहत लगभग 25 से 30 हजार सतपर्णी के पौधे लगाए होंगे। बाद में, प्रदेश के अन्य शहरों ने भी तेजी से हरियाली लाने के लिए इस मॉडल को अपना लिया। मेरा अनुमान है कि आज प्रदेश में 50,000 से अधिक सतपर्णी के पेड़ मौजूद हैं। हालांकि, वे मानते हैं कि सरकार का अब इन्हें न लगाने का निर्णय सही है, लेकिन वे दशकों पुराने पेड़ों को काटने पर चिंता व्यक्त करते हैं। डॉक्टरों की चेतावनी: एलर्जी को बढ़ाते हैं ये पेड़
शहर के जाने-माने श्वास रोग विशेषज्ञ, डॉ. लोकेंद्र दवे, इन पेड़ों से होने वाले स्वास्थ्य जोखिमों की पुष्टि करते हैं। वे बताते हैं, कोनोकार्पस और सतपर्णी, दोनों के फूलों से भारी मात्रा में परागकण निकलते हैं। ये हवा में घुलकर लोगों की सांसों में चले जाते हैं। जिन लोगों की इम्यूनिटी कमजोर होती है या जिन्हें पहले से ही एलर्जी की प्रवृत्ति है, उनके लिए यह बेहद खतरनाक है। इससे अस्थमा के दौरे पड़ सकते हैं, लगातार सर्दी-खांसी, आंखों में जलन और सांस लेने में तकलीफ जैसी समस्याएं आम हो जाती हैं। डॉ. दवे विशेष रूप से सर्दियों के मौसम में सतपर्णी से होने वाले खतरे पर जोर देते हैं। सर्दियों में इन पेड़ों पर फूल लगते हैं, और यही वह समय होता है जब एलर्जी के मामले बढ़ जाते हैं। विशेषज्ञ बोले- 40 साल की हरियाली खत्म होने से बढ़ेगा प्रदूषण
वन विहार के पूर्व उप निदेशक डॉ. सुदेश वाघमारे, जिन्होंने स्वयं सीपीए में रहते हुए सतपर्णी का रोपण कराया है, इस पर मिली-जुली राय रखते हैं। वे कहते हैं, यह सच है कि इस पेड़ के फूलों की गंध बहुत तीखी होती है, जो कई बार श्वास रोगियों के लिए परेशानी का सबब बन सकती है। लेकिन, परागण के मौसम में कई अन्य पेड़ों के साथ भी ऐसा होता है। इसे पूरी तरह से हानिकारक मान लेना शायद सही नहीं होगा। वहीं विशेषज्ञों का मानना है कि नए पौधों पर प्रतिबंध लगाना एक स्वागत योग्य कदम है, लेकिन 30 से 40 साल पुराने, घने और छायादार पेड़ों को रिप्लेस करने का अभियान एक दोधारी तलवार साबित हो सकता है। इसके लिए वे तीन कारण गिनाते हैं… 6 राज्यों में कोनोकार्पस लगाने पर प्रतिबंध
मध्य प्रदेश इस तरह का कदम उठाने वाला पहला राज्य नहीं है। गुजरात, तमिलनाडु, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और असम जैसे राज्य पहले ही कोनोकार्पस के खतरों को भांपते हुए इसके रोपण पर प्रतिबंध लगा चुके हैं और पुराने पेड़ों को हटाकर उनकी जगह नीम, पीपल, बरगद, अमलतास जैसी स्थानीय प्रजातियों को लगाने का काम कर रहे हैं।
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