MP ही नहीं यूपी से भी उमड़ते हैं श्रद्धालु, ये मेला बना आस्था का केंद्र, आल्हा-ऊदल से जुड़ा है कनेक्शन

MP ही नहीं यूपी से भी उमड़ते हैं श्रद्धालु, ये मेला बना आस्था का केंद्र, आल्हा-ऊदल से जुड़ा है कनेक्शन


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Maa Dhandha Giri Mela: छतरपुर जिले के बारीगढ़ के नजदीक मां धंधागिरि माता के दरबार में सालों से एक ऐसा भी मेला लगता है. जिसका संबंध आल्हा-ऊदल से जोड़ा जाता है. मान्यता है कि यहां आल्हा-ऊदल माता के दर्शन करने आते थे, तभी से यहां मेला लगने की शुरुआत हो गई थी. इस मेले को देखने के लिए लोग दूर-दराज से भी आते हैं. साथ ही इस मेले में दंगल का आयोजन भी किया जाता है.

Maa Dhandha Giri Mela: छतरपुर जिले के बारीगढ़ के नजदीक मां धंधागिरि माता के दरबार में सालों से एक ऐसा भी मेला लगता है. जिसका संबंध आल्हा-ऊदल से जोड़ा जाता है. मान्यता है कि इस मंदिर में चंदेल सेनापति आल्हा-ऊदल भी माता के दर्शन करने आते थे. तभी से यहां मेला लगने की शुरुआत हो गई थी. इस मेले को देखने के लिए लोग दूर-दराज से भी आते हैं. साथ ही यहां माता के दर्शन करने के लिए भी लोग दिल्ली ,झांसी और कानपुर जैसे शहरों से आते हैं.

मेला देखने आए स्थानीय श्रद्धालु बताते हैं कि यह मेला बहुत ही पुराना है. जब से हम बारीगढ़ में बसे हैं तभी से इस मेले को देखते आ रहे हैं. 30 सालों से तो हर साल हम ही यहां आते हैं.

मनोरंजन नहीं धार्मिक मेला है 
वहीं, अन्य श्रद्धालु बताते हैं कि यह मेला हर साल मकर संक्रांति पर लगता है. इसके बाद यह अगले 10 दिनों तक लगा रहता है. यहां दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं क्योंकि यह एक मनोरंजन का मेला ही नहीं है. यह एक धार्मिक मेला है जिसका संबंध माताजी से जुड़ा हुआ है. लोग यहां आकर सबसे पहले मां धंधा गिरि देवी के दर्शन जरूर करते हैं फिर मेले का आनंद लेते हैं. यहां मप्र से ही नहीं बल्कि उत्तरप्रदेश के महोबा, बांदा और झांसी से भी लोग आते हैं.

10 दिनों तक मेले का आयोजन 
मां धंधा गिरी देवी मंदिर के पुजारी अरविंद कुमार गोस्वामी लोकल 18 से बातचीत में बताते हैं कि यह मेला सात पीढ़ियों से लग रहा है. ये मेला पहले सिर्फ दो दिन लगा करता था. इसके बाद यह मेला 10 दिनों तक लगने लगा.

मकर संक्रांति पर्व से मेले की शुरुआत 
पुजारी बताते हैं कि मकर संक्रांति से इस मेले की शुरुआत हो जाती है और 10 दिनों तक यह मेला चलता है. यह मेल सिर्फ खाने-पीने और मनोरंजन के लिए नहीं लगता है बल्कि माता के द्वार में लगने वाला एक उत्सव होता है. जहां लोग आकर माता के पहले दर्शन करते हैं और इसके बाद फिर मेले का आनंद लेते हैं.

आल्हा-ऊदल आते थे माता के दर्शन करने 
पुजारी बताते हैं कि ये मेला माता के द्वार पर लगता है. मां धंधा गिरि देवी पहाड़ पर विराजमान हैं और पहाड़ के नीचे मेला लगता है. छतरपुर जिले के बारीगढ़ से लगभग 3 किमी दूर स्थित है मां धंधागिरि मंदिर के बारे में मान्यता यह है कि इस मंदिर में स्वयं माता चलकर आईं थी. इसी मंदिर में चंदेल राजाओं के सेनापति आल्हा और ऊदल भी आते थे. मंदिर के पुजारी के मुताबिक माता स्वयं धनौरा से चलकर यहां आईं थीं. माता ने बारीगढ़ के बनाफर परिवार के सपने में आईं थीं और कहा था कि जहां घोड़े की लीड मिले, वहीं मेरी स्थापना कर दी जाए.

दंगल का आयोजन भी होता है 
पुजारी बताते हैं कि यहां हर साल मेला के साथ दंगल का आयोजन भी किया जाता है यह भी एक पुरानी परंपरा है. वीर आल्हा-ऊदल की नगरी रही है तो यहां दंगल का आयोजन भी किया जाता है. इस दंगल को देखने के लिए इस मेले में लाखों की संख्या में भीड़ होती है.

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Deepti Sharma

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दिल्ली से झांसी तक से श्रद्धालु आते हैं इस मेले में, लाखों की भीड़ होती शामिल



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