क्या जनरल कैटेगरी के साथ नहीं होता भेदभाव? UGC के नए नियमों पर क्या बोले कानून एक्सपर्ट

क्या जनरल कैटेगरी के साथ नहीं होता भेदभाव? UGC के नए नियमों पर क्या बोले कानून एक्सपर्ट


रिपोर्ट-प्रवीन पटेल/जबलपुर

यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन (UGC) ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद साल 2026 में नए नियम बनाए हैं. ये नियम इसलिए बनाए हैं, ताकि विश्व विद्यालय और कॉलेज में जातिगत भेदभाव रोके जा सकें. यूजीसी हर यूनिवर्सिटी में एक कमेटी बनाएगी, जो शिकायतें सुनेगी. लेकिन खास बात ये है कमेटी में ST, SC, ओबीसी, दिव्यांग और महिलाओं का होना जरूरी है, जबकि सवर्णों को इससे बाहर रखा गया है. अब यूजीसी के नियम को लेकर विधि विशेषज्ञ एडवोकेट अनिल गौतम ने कमी और समस्याएं बताई हैं.

सवाल: क्या पहले जो कमेटी बनाई है थी वह समानता का अधिकार नहीं दे रही थी?
जवाब: यूजीसी के द्वारा एक समिति बनाई गई है. यूजीसी वह संस्था है, जो उच्चा शिक्षा के लिए नियमों का निर्धारण करती है. नियम 3 सी के तहत इन्होंने नियम बनाए, जिसमें समिति बनाने की बात कही है, जो समानता को प्रोत्साहित करे.

क्या अभी तक समानता थी या नहीं. अगर हम बात करें, तो ये नियम संवैधानिक चुनौती के लायक है. अनुच्छेद 14, 15 का उल्लंघन समझ में आ रहा है, जो हमारा शिक्षा का अधिकार का है, जो सभी के लिए है और वहां वर्ग विभेद की बात नहीं है. अनुच्छेद 21 में सभी को शिक्षा का समान अवसर की बात कही गई है.

सवाल: क्या सवर्णों के साथ भेदभाव या अत्याचार नहीं होता है?
जवाब: यूजीसी का यह जो नियम है, उसमें समिति बनाने की बात की गई है. वह विभेद पूर्ण है, क्योंकि इसने समाज को दो हिस्सों में बांट दिया है, इनका नियम पूर्वाग्रह से ग्रसित है कि सवर्ण समाज ही भेदभाव करता है. सवर्ण समाज के साथ भेदभाव नहीं होता है.

सवाल: क्या यह कमेटी जब किसी SC, ST या महिला या दिव्यांग की शिकायत सुनेगी तो निर्णय निष्पक्ष होगा?
जवाब: इन्होंने जो कमेटी बनाई है, उस कमेटी में जिन्हें रखा है, ओबीसी, एसी, एसटी महिलाएं और दिव्यांग के लोग होंगे और केवल वही लोग शिकायत कर सकेंगे. सवर्ण समाज को क्या समानता का अधिकार नहीं है. ये चुनौती पूर्ण है, क्योंकि संविधान में सभी के लिए समान अधिकार की बात कही गई है. वर्ग विशेष के लिए नहीं.

कहां से हुई विवाद की शुरुआत
रोहित वेमुला और पायल तड़वी के दो केस थे, जिसको लेकर सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी को गाइडलाइन जारी करने का निर्देश दिया था. उच्च शिक्षा में जो स्तर गिर रहा है. उसको लेकर यूजीसी नियम बनाए. लेकिन 1956 के एक्ट के तहत कहीं ना कहीं रेग्यूलेशन की जो शक्ति दी गई है. इनको कानून बनाने का अधिकार नहीं है. नियम बनाने का अधिकार है. इन्होंने इसे कानून की तरह बनाया है. इसलिए देश में इतना ज्यादा विरोध हो रहा है और विरोध स्वाभाविक है.

उन्होंने कहा कि यह कोर्ट में टिकने लायक नियम नहीं है. इसकी सीमाएं है और इसको सीमाओं में रखना पड़ेगा या फिर सभी के लिए खोलना पड़ेगा.पहले भी शिकायत होती थीं, लेकिन उसमें वर्ग भेद नहीं है. अगर यही करना है, तो संवैधानिक लेवल पर जाएं और शिक्षा के लेवल पर सभी तरह की कास्ट खत्म कर दी जाएं, क्या सवर्ण समाज के लोग गरीब नहीं होते है? क्या उनके साथ भेदभाव नहीं होता है? सीमाओं का उल्लंघन हुआ है, इसे हाई कोर्ट या फिर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाएगी.



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