Balaghat News: आमतौर पर खेती किसान की अजीविका का साधन है, लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं, जिनमें खेती का जुनून होता है. वह पूरा जीवन खेती पर कुर्बान कर देते हैं. ऐसे किसान खेती में नित नए प्रयोग भी करते हैं. ऐसे ही एक किसान हैं, जो कभी पेशे शिक्षक थे. लेकिन, रिटायरमेंट के बाद खेती का ऐसा खुमार चढ़ा कि खेतों में कई तरह के प्रयोग करने लगे. आज उन्हें ‘ग्राफ्टिंग किंग’ के नाम से जाना जाता है. दरअसल, बालाघाट से लगे गांव बगदरा के रहने वाले हरीश सुलाखे ने खेत में करीब 150 से ज्यादा पौधों की ग्राफ्टिंग कर पौधों की रोपाई की है. इसमें आम, अमरूद, चीकू और मुनगा सहित तमाम पेड़ों पर ग्राफ्टिंग की है. इसी क्रम में उन्होंने एक खास तरह का आम पौधा उगा दिया, जो अब चर्चा में है.
क्या है ग्राफ्टिंग?
बागवानी की एक ऐसी तकनीक जिसमें दो अलग-अलग पौधे के हिस्सों को ऐसे जोड़ा जाता है, जिससे दो अलग-अलग किस्म के पौधे एक साथ उग सकें. इससे एक पेड़ पर अलग-अलग किस्म की फसल ली जाती है. इसकी दो तरह की ग्राफ्टिंग होती है, जिसमें सायन और रूट स्टॉक. सायन में पौधे के ऊपरी हिस्से के किसी टहनी में दूसरे पौधे की ग्राफ्टिंग होती है. वहीं, रूट स्टॉक में किसी पेड़ की जड़ में अन्य पेड़ के तने की ग्राफ्टिंग होती है. जैसे बैंगन की जड़ में टमाटर लगाना या फिर आलू के साथ टमाटर लगाना. इस तरह की रूटस्टॉक ग्राफ्टिंग होती है.
क्यों करें ग्राफ्टिंग?
हरिश सुलाखे बताते हैं कि खेत में फलों की देसी वैरायटी में फल लगने में समय लगता है. ऐसे में इस समस्या से निपटने के लिए उन्होंने देसी किस्मों में अच्छी वैरायटी के पौधों का चयन किया. फिर एक पेड़ में दूसरे पेड़ की शाखा की ग्राफ्टिंग की. इससे पौधे का विकास तेजी से होता है. वहीं, एक पेड़ पर अलग-अलग किस्मों के फल लगते हैं. रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है. यह पौधे कम तापमान में न सिर्फ जीवित रहते हैं, बल्कि अच्छी ग्रोथ भी करते हैं. एक ऐसा ही आम का पेड़ उनके खेत में है, जिसने महज साल भर में फल देना शुरू कर दिया. अमूमन आम बाग में यह पेड़ कम से कम तीन साल बाद फल देता. वहीं, उनके खेत ऐसे कई पेड़ हैं जो महज साल भर में फल देने के लिए तैयार हो गए हैं.
कैसे करते हैं ग्राफ्टिंग?
ग्राफ्टिंग करने की तीन विधियां होती हैं, जिसमें टी-बडिंग, क्लेफ्ट ग्राफ्टिंग और व्हिप ग्राफ्टिंग होती है. इसमें सबसे ज्यादा प्रचलित और सफल होनी ग्राफ्टिंग टी-बडिंग है. टी बडिंग में एक कली को दूसरे पौधे के तने में अंग्रेजी के T आकार में कट लगाकर फिट किया जाता है. हरिश सुलाखे ज्यादातर टी बडिंग का सहारा लेते हैं.
हरिश सुलाखे ने आम के लगभग 30, नींबू के 20, मुनगा के 30, चीकू के 20 से ज्यादा पौधे की बडिंग कर चुके. इसके अलावा अमरूद और बेर के भी कई पेड़ों पर ग्राफ्टिंग की है. इसके लिए अच्छी किस्मों के लिए वह महाराष्ट्र के गोंदिया और छत्तीसगढ़ के रायपुर से पौधे मंगाए हैं.