जब नक्सलियों ने घेरा, तब भी लड़े थे हरिशचंद्र…घटना को याद कर भावुक हुईं मां

जब नक्सलियों ने घेरा, तब भी लड़े थे हरिशचंद्र…घटना को याद कर भावुक हुईं मां


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Balaghat News: रिसेवाड़ा में उसी दिन साप्ताहिक बाजार लगा था. हरिशचंद्र राहंगडाले वहां से अपने साथियों के साथ निकले. वे लोग दो बाइक पर थे. टीमकीटोला के पास के जंगल में 15 से 20 नक्सली घात लगाए बैठे थे.

बालाघाट. मध्य प्रदेश के बालाघाट से भले ही नक्सलवाद के जड़ से खत्म होने का दावा किया जा रहा हो लेकिन उसके दिए जख्म अब भी हरे हैं. 35 वर्षों की इस लड़ाई में बालाघाट ने बहुत कुछ खोया है. माओवादी कभी आम नागरिकों को मुखबिरी के शक में मौत के घाट उतार देते थे, तो कभी सुरक्षाबलों के जवानों पर घात लगाकर हमला कर उनकी जान ले लेते थे. आज आप और हम इस बात का जश्न मना रहे हैं कि माओवाद खत्म हो चुका है लेकिन शहीदों के परिवारों में आज भी वो दर्द गहराई से भरा हुआ है. उन्हीं शहीदों में से एक हैं हरिशचंद्र राहंगडाले, जिनकी हत्या माओवादियों ने की थी. इस बात को करीब 16 साल बीत गए हैं. ऐसे में पुलिस हो या उनके गांव के लोग, उनकी कुर्बानी को जरूर याद करते हैं. दरअसल, 26 जनवरी को उनकी याद में पुलिस थाना हट्टा में एक शहीद पुलिसकर्मी हरिशचंद्र राहंगडाले वाटिका बनवाई गई. उनके गांव पीपरझरी में उनके स्मारक पर लोग एकत्रित हुए और श्रद्धांजलि दी.

हरिशचंद्र राहंगडाले के साथ नौकरी शुरू करने वाले राजेश पटले लोकल 18 को बताते हैं कि 22 सितंबर 2010 की बात है, उस समय शहीद हरिशचंद्र राहंगडाले सुलसूली चौकी में पदस्थ थे. वहां पर किन्हीं कारणों से उन्हें और उनके तीन साथियों को सीतापाला चौकी में ड्यूटी के लिए बुलाया गया. उसी दिन रिसेवाड़ा में साप्ताहिक बाजार लगा था. वह वहां से अपने साथियों के साथ निकले थे. वे लोग दो मोटरसाइकिल पर थे. टीमकीटोला के पास के जंगल में 15 से 20 नक्सली घात लगाकर बैठे हुए थे. अचानक शाम करीब पांच बजे नक्सलियों ने फायरिंग शुरू कर दी. ऐसे में जवानों को संभलने का मौका तक नहीं मिला. आगे बाइक पर सवार हरिशचंद्र को पीठ पर गोली लगती है, वहीं बाइक चला रहे जवान को हाथ पर गोली लगी. हरिशचंद्र ने तब भी नक्सलियों का मुकाबला किया था. उनके साथी तो अपनी जान बचाने में सफल हो गए लेकिन उनकी जान नहीं बच पाई. मौके पर ही उनकी मौत हो गई. जब फोर्स घटनास्थल पर पहुंचती है, तब तक नक्सली फरार हो चुके थे.

23 सितंबर को हुआ अंतिम संस्कार
23 सितंबर 2010 को हरिशचंद्र के पैतृक गांव में उनका अंतिम संस्कार हुआ. पूर्व सरपंच देवी शंकर टेंभरे बताते हैं कि 22 सितंबर की शाम साढ़े सात बजे खबर उनके गांव पहुंची. गांव में शोक की लहर दौड़ गई. उस शाम किसी हलक से निवाला तक नहीं उतरा था. अगले दिन जब अंतिम संस्कार हुआ, तो तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी गांव आए और शहीद को कंधा दिया. गांव में 45 दिन के भीतर एक स्मारक भी बनाया गया.

शादी को हुए थे साढ़े तीन महीने
हरिशचंद्र के पिता घनश्याम राहंगडाले ने कहा कि बेटे की शादी को केवल साढ़े तीन महीने ही बीते थे कि उनका सपूत महज 27 साल की उम्र में मातृभूमि की रक्षा में वीरगति को प्राप्त हो गया. जिंदगी भर का दुख तो मिला है लेकिन उनके जाने के बाद भी उनके बेटे का नाम रहेगा. उनकी मां कुस्मन बाई अपने बेटे को याद कर भावुक हो गईं. उन्होंने कहा कि जब भी घर आता था, तो भी उसके अंदर बचपना ही था. नक्सलवाद भले ही खत्म हो चुका हो लेकिन वह अपने छोटे बेटे को उस इलाके में कभी नौकरी करने नहीं देना चाहती हैं.

सरेंडर करने वाले नक्सलियों पर उठाए सवाल
अजय कटरे बताते हैं कि हरिशचंद्र उनके बचपन के दोस्त थे. साथ ही में पुलिस भर्ती की तैयारी की थी. ऐसे में उनसे खास जुड़ाव था. जिन लोगों (नक्सलियों) की वजह से हम अपनों को खो रहे हैं, उन्हें स्पेशल ट्रीटमेंट मिल रहा है. इससे शहीदों के मां-बाप पर क्या गुजरती है, यह वहीं जानते हैं. यह बात सरकार को भी सोचनी चाहिए. सरकार द्वारा नक्सलियों का रेड कारपेट पर स्वागत करना बहुत दुखद है. वो तो देश विरोधी थे. वहीं जिन्होंने नागरिकों की सुरक्षा, देश के संविधान और अखंडता के लिए अपनी जान गंवाई, उसपर भी सरकार को सोचना चाहिए.

हरिशचंद्र की याद में बना पार्क
हट्टा थाना प्रभारी अविनाश सिंह ने कहा कि शहीद हरिशचंद्र की याद में एक पार्क का निर्माण करवाया गया है. इसके उद्घाटन के लिए उनके माता-पिता को बुलाया गया था. इस पहल से शहीदों के परिवार और पुलिस का संबंध सदा बना रहेगा. इसके अलावा पुलिस समय-समय पर शहीदों के परिजनों से मिलती रहती है.

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Rahul Singh

राहुल सिंह पिछले 10 साल से खबरों की दुनिया में सक्रिय हैं. टीवी से लेकर डिजिटल मीडिया तक के सफर में कई संस्थानों के साथ काम किया है. पिछले चार साल से नेटवर्क 18 समूह में जुड़े हुए हैं.

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