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देवास जिले के हाटपिपल्या क्षेत्र के कवाड़िया गांव में वसंत पंचमी पर गाय लक्ष्मी और नंदी पूर्णा का विवाह पूरे सनातन विधि-विधान से संपन्न हुआ. पांच दिनों तक चली रस्मों में पूरा गांव बाराती बना. यह आयोजन गौ-सेवा, आस्था और सांस्कृतिक मूल्यों का संदेश देता है.
देवास. जिले के हाटपिपल्या क्षेत्र से आस्था, परंपरा और संस्कृति से जुड़ी एक ऐसी खबर सामने आई है, जिसने पूरे इलाके का ध्यान अपनी ओर खींचा है. वसंत पंचमी के पावन अवसर पर यहां एक गाय का विवाह पूरे सनातन विधि-विधान और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ संपन्न कराया गया. यह आयोजन किसी प्रतीकात्मक कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पूरी तरह पारंपरिक विवाह की तरह हुआ. गांव कवाड़िया में आयोजित इस अनोखे विवाह में गाय लक्ष्मी और नंदी पूर्णा को दूल्हा-दुल्हन की तरह सजाया गया. बैंड-बाजे के साथ बारात निकली, विवाह पत्रिका छपवाई गई और पूरे गांव ने मिलकर विवाह की रस्में निभाईं. इस आयोजन ने यह संदेश दिया कि ग्रामीण समाज में आज भी परंपरा, संवेदनशीलता और सांस्कृतिक मूल्यों की गहरी जड़ें मौजूद हैं.
देवास जिले के हाटपिपल्या क्षेत्र में यह अनूठी परंपरा केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि गौ माता के प्रति श्रद्धा और सम्मान की जीवंत मिसाल है. कवाड़िया गांव में आयोजित इस विवाह ने यह साबित किया कि ग्रामीण समाज में पशुओं को केवल साधन नहीं, बल्कि परिवार का हिस्सा माना जाता है. गाय लक्ष्मी को आयोजक लोकेंद्र सिंह सैंधव ने बेटी की तरह पाला था. वसंत पंचमी के शुभ अवसर पर उसका विवाह नंदी पूर्णा के साथ पूरे रीति-रिवाजों से कराया गया. पांच दिनों तक चलने वाले इस आयोजन में हल्दी, मेहंदी, गणेश पूजन, पसी भराई और मंगल गीतों जैसी रस्में निभाई गईं. पूरे गांव ने बाराती बनकर सहभागिता निभाई. यह आयोजन न किसी मन्नत से जुड़ा था और न किसी दिखावे से, बल्कि शुद्ध रूप से आस्था और सेवा भाव से प्रेरित था.
सनातन परंपरा के अनुसार हुआ गाय का विवाह
गाय लक्ष्मी और नंदी पूर्णा का विवाह पूरी तरह सनातन परंपराओं के अनुसार संपन्न हुआ. वैदिक मंत्रोच्चार के बीच पंडितों ने सभी वैवाहिक संस्कार कराए. विवाह को वास्तविक स्वरूप देने के लिए बाकायदा विवाह पत्रिका छपवाई गई. बारात गांव की गलियों से होती हुई विवाह स्थल तक पहुंची. बैंड-बाजे, ढोल और पारंपरिक गीतों ने माहौल को उत्सवमय बना दिया. जोरदार आतिशबाजी हुई और पूरे गांव के महिला पुरुषों ने नाचकर उत्सव की तरह बने माहौल में बारात का रंग जमाया.
पांच दिनों तक चलीं पारंपरिक रस्में
इस अनोखे विवाह की खास बात यह रही कि इसे एक दिन का आयोजन न बनाकर पूरे पांच दिनों तक पारंपरिक रूप से मनाया गया. गांव में रोजाना अलग-अलग रस्में निभाई गईं और ग्रामीणों की सक्रिय भागीदारी रही. इस विवाह में निभाई गई प्रमुख रस्में:
- हल्दी और मेहंदी की रस्म
- गणेश पूजन और मंगल गीत
- पसी भराई की परंपरा
- बैंड-बाजों के साथ बारात
- विधिवत कन्यादान संस्कार
नंबरिंग के साथ आयोजन की विशेषताएं
- गाय लक्ष्मी को दुल्हन की तरह वस्त्र और आभूषण पहनाए गए.
- नंदी पूर्णा को दूल्हे की तरह पारंपरिक साफा बांधा गया.
- विवाह पत्रिका छपवाकर अतिथियों को आमंत्रण दिया गया.
- पूरे गांव के लिए भोजन की व्यवस्था की गई.
- कन्यादान से मिली राशि गौ-सेवा में लगाने का निर्णय लिया गया.
गौ-सेवा और सामाजिक संदेश
आयोजनकर्ता लोकेंद्र सिंह सैंधव ने बताया कि यह विवाह किसी मन्नत या धार्मिक भय से नहीं, बल्कि गौ माता के प्रति श्रद्धा और सम्मान का प्रतीक है. कन्यादान के दौरान प्राप्त राशि का उपयोग गायों के संरक्षण, चारा और देखभाल के लिए किया जाएगा. उनका कहना है कि गाय को लक्ष्मी का स्वरूप मानकर पूजा जाता है और यह आयोजन उसी भावना को आगे बढ़ाता है. यह विवाह ग्रामीण समाज में पशु कल्याण और संवेदनशीलता का संदेश देता है.
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सुमित वर्मा, News18 में 4 सालों से एसोसिएट एडीटर पद पर कार्यरत हैं. बीते 3 दशकों से सक्रिय पत्रकारिता में अपनी अलग पहचान रखते हैं. देश के नामचीन मीडिया संस्थानों में सजग जिम्मेदार पदों पर काम करने का अनुभव. प…और पढ़ें